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ति॒स्रो जि॒ह्वा वरु॑णस्या॒न्तर्दी॑द्यत्या॒सनि॑। तासां॒ या मध्ये॒ राज॑ति॒ सा व॒शा दु॑ष्प्रति॒ग्रहा॑ ॥

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Pad Path

तिस्र: । जिह्वा: । वरुणस्य । अन्त: । दीद्यति । आसनि । तासाम् । या । मध्ये । राजति । सा । वशा । दु:ऽप्रतिग्रहा ॥१०.२८॥

Atharvaveda » Kand:10» Sukta:10» Paryayah:0» Mantra:28


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।

Word-Meaning: - (वरणस्य) वरुण [श्रेष्ठ परमेश्वर] के (आसनि अन्तः) मुख के भीतर (तिस्रः) तीन [सत्त्व, रज और तम रूप] (जिह्वाः) जीभें (दीद्यति=०-न्ति) चमकती हैं। (तासाम्) उन [जीभों] के (मध्ये) बीच में (या) जो (राजति) राज करती है, (सा) वह (दुष्प्रतिग्रहा) पाने में कठिन (वशा) वशा [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] है ॥२८॥
Connotation: - परमेश्वर के मुखरूप सृष्टि में सत्त्व गुण, रजोगुण और तमोगुण रूप तीन जिह्वा हैं। इन तीनों की अधिष्ठात्री विशाल परमेश्वरशक्ति है, जिस का प्रभाव समझना मनुष्य को बड़ा कठिन है ॥२८॥
Footnote: २८−(तिस्रः) सत्त्वरजस्तमोरूपाः (जिह्वाः) (वरुणस्य) वरणीयस्य श्रेष्ठस्य परमेश्वरस्य (अन्तः) मध्ये (दीद्यति) दीदयतिर्ज्वलतिकर्मा-निघ० १।१६। नैरुक्तो धातुः, दिवादित्वम् एकवचनं च छान्दसम्। दीद्यन्ति। दीप्यन्ते (आसनि) मुखे (तासाम्) जिह्वानाम् (या) (मध्ये) (राजति) ईष्टे। दीप्यते (सा) (वशा) म० २ (दुष्प्रतिग्रहा) दुःखेन ग्राह्या प्राप्तव्या ॥