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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।
Word-Meaning: - (वशे) हे वशा ! [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] (यत्) जब (क्रुद्धः) क्रुद्ध (धनपतिः) धनों के स्वामी [परमेश्वर] ने (ते) तेरे लिये (क्षीरम्) जल [उत्पत्ति साधन] को (आ अहरत्) [दुष्ट जन से] ले लिया, (तत्) तब (इदम्) जल को (अद्य) आज (नाकः) क्लेशशून्य [आनन्दस्वरूप परमात्मा] (त्रिषु) तीन [ऊँचे, नीचे और मध्य] (पात्रेषु) रक्षा के आधार [लोकों] में (रक्षति) रक्षित रखता है ॥११॥
Connotation: - परमात्मा की महिमा को न माननेवाले पुरुष को [मन्त्र १० देखो] वह क्रुद्ध जगदीश्वर निर्बल करके उत्पत्ति साधन आदि द्रव्य को यथानियम ऊपर-नीचे और मध्य लोकों में विभाग करके देता है ॥११॥
Footnote: ११−(यत्) यदा (ते) तुभ्यम् (क्रुद्धः) कुपितः (धनपतिः) धनानां स्वामी परमेश्वरः (आ) समन्तात् (क्षीरम्) जलम् (अहरत्) गृहीतवान् (वशे) म० २। हे कमनीये (इदम्) इन्देः कमिन्नलोपश्च। उ० ४।१५७। इदि परमैश्वर्ये-कमिन्, नलोपः। उदकम्-निघ० १।१२। (तत्) तदा (अद्य) अस्मिन् दिने (नाकः) क्लेशशून्यः। सुखस्वरूपः परमेश्वरः (त्रिषु) उच्चनीचमध्येषु (पात्रेषु) रक्षाधारेषु लोकेषु (रक्षति) पाति ॥
