Reads 164 times
PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
परस्पर उपकार के लिये उपदेश।
Word-Meaning: - (यत्र) जिस जल में से (गावः) सूर्य की किरणों [वा गौएँ आदि जीव वा भूमि प्रदेश] (नः) हमारे लिये (हविः) देने वा लेने योग्य अन्न वा जल (कर्त्वम्) उत्पन्न करने को (सिन्धुभ्यः) बहनेवाले समुद्रों से (पिबन्ति) पान करती हैं। (देवीः) उस उत्तम गुणवाले (अपः) जल को (उप) आदर से (ह्वये) मैं बुलाता हूँ ॥३॥
Connotation: - जल को सूर्य की किरणें समुद्र आदि से खींचती हैं, वह जल फिर बरस कर हमारे लिये अन्न आदिक पदार्थ उत्पन्न करके सुख देता है। अथवा गौ आदि सब प्राणी जल द्वारा उत्पन्न पदार्थों से सुखी होकर सबको सुखी करते हैं, वैसे ही हमको परस्पर सहायक और उपकारी होना चाहिये ॥३॥
Footnote: ३−अपः। आप्नोतेर्ह्रस्वश्च। उ० २।५८। इति आप्लृ व्याप्तौ-क्विप्। इति अप्। अप् शब्दो नित्यस्त्रीलिङ्गो बहुवचनान्तश्च। व्यापयित्रीः, जलधाराः। जलवत् उपकारिणः पुरुषान्। देवीः, नन्दिग्रहिपचादिभ्यः०। पा० ३।१।१२४। इति दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमद-स्वप्नकान्तिगतिषु−पचाद्यच्। ङीप्। दिव्याः, द्योतमानाः। ह्वये। अहमाह्वयामि। यत्र। यासु अप्सु। गावः १।२।३। धेनवः। उपलक्षणमेतत्। सर्वे जीवा इत्यर्थः। सूर्यकिरणः। भूलोकाः। पिबन्ति। पाघ्रा० इत्यादिना। पा० ७।३।७८। इति पा पाने-शपि पिबादेशः। पानं कुर्वन्ति। नः। अस्मदर्थम्। सिन्धुभ्यः स्यन्देः सम्प्रसारणं धश्च। उ० १।११। इति स्यन्दू स्रवणे-उ प्रत्ययः, दस्य धः सम्प्रसारणं च। स्यन्दनशीलेभ्यः समुद्रेभ्यः सकाशात्। कर्त्वम्। डुकृञ् करणे-तुम्। छान्दसं रूपम्। कर्तुम्। हविः। अर्चिशुचिहुसृपिछादिछर्दिभ्य इसिः। उ० २।१०८। इति। हु दानादानादनेषु-इसि। यद्वा। ह्वेञ् आह्वाने−इसि। हूयते दीयते गृह्यते वा तद् हविः। हव्यम्। अन्नम् आवाहनम्। उदकम्−निघं० १।१२ ॥
