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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
राजतिलकयज्ञ के लिये उपदेश।
Word-Meaning: - (यथा) जिससे कि (सपत्नक्षयणः) शत्रुओं का नाश करनेवाला (वृषा) ऐश्वर्यवाला (विषासहिः) सदा विजयवाला (अहम्) मैं (अभिराष्ट्रः) राज्य पाकर (एषाम्) इन (वीराणाम्) वीर पुरुषों का (च) और (जनस्य) लोकों का (विराजानि) राजा रहूँ ॥६॥
Connotation: - राजा सिंहासन पर विराज कर राजघोषणा करते हुए शूरवीर योद्धाओं और विद्वान् जनों का सत्कार और मान करके शासन करे ॥६॥
Footnote: ६−सपत्न-क्षयणः। म० ४। शत्रुनाशकः। वृषा। १।१२।१। वृषु ऐश्ये−कनिन्। ऐश्वर्यवान्। सुखवर्षकः। इन्द्रः। महाबली। अभि-राष्ट्रः। म० १। अभिगतराज्यः। प्राप्तराज्यः। विषासहिः। सहिवहिचलिपतिभ्यो यङन्तेभ्यः किकिनौ वक्तव्यौ। वा० पा० ३।२।१७१। इति षह अभिभवे−कि। अल्लोपयलोपौ। विविधं पुनः पुनः परेषां सोढा, अभिभविता। एषाम्। उपस्थितानाम्। वीराणाम्। वीर विक्रान्तौ−पचाद्यच्। विक्रान्तानां, शूराणाम्, भटानाम्। वि-राजानि। राजति=ईष्टे−निघ० २।२१। ईश्वरः शासिता भवानि। जनस्य। जनी प्रादुर्भावे−अच्। अधीगर्थदयेषां कर्मणि। पा० २।३।५२। इति षष्ठी। लोकस्य, प्राणिजातस्य ॥
