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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
महारोग के नाश के लिये उपदेश।
Word-Meaning: - (प्रथमा) प्रथम प्रकट हुई (आसुरी) प्रकाशमय परमेश्वर की माया [बुद्धि वा ज्ञान] ने (इदम्) इस [वस्तु] को (किलासभेषजम्) रूपनाशक महा रोग की ओषधि और (इदम्) इस [वस्तु] को ही (किलासनाशनम्) रूप बिगाड़नेवाले महारोग की नाश करनेहारी (चक्रे) बनाया। [उसने] [ईश्वर माया ने] (किलासम्) रूप बिगाड़नेवाले महारोग को (अनीनशत्) नाश किया और (त्वचम्) त्वचा को (सरूपाम्) सुन्दर रूपवाली (अकरत्) बना दिया ॥२॥
Connotation: - (आसुरी) प्रकाशस्वरूप परमेश्वर की शक्ति से प्रलय के पश्चात् अनेक विघ्नों के हटाने पर मनुष्य के सुखदायक पदार्थ उत्पन्न हुए, जिससे पृथिवी पर समृद्धि और क्षुधा आदि रोगों की निवृत्ति हुई ॥२॥
Footnote: २−आसुरी। म० १। प्रकाशमयपरमेश्वरस्य माया प्रज्ञा। चक्रे। म० १। कृतवती। प्रथमा। म० १। आदिभूता। इदम्। प्रसिद्धम्। उपस्थितम्। किलास-भेषजम्। किलासम्। १।२३।१। किल+असु क्षेपणे−अण्। भिषजो वैद्यस्येदमिति अण् निपातनाद् एत्वम् यद्वा, भेषं भयं रोगं जयतीति जि−ड। रुपनाशकस्य महारोगस्य औषधम्। किलास-नाशनम्। कृत्यल्युटो बहुलम्। पा० ३।३।११३। इति किलास+णश अदर्शने−कर्तरि ल्युट्। किलासस्य रूपनाशकस्य महारोगस्य कुष्ठादिकस्य निवर्तकम्। अनीनशत्। णश अदर्शने−णिच्, लुङ्। नाशयति स्म। किलासम्। १।२३।१। वर्णनाशकं महारोगम्। सरूपाम्। ज्योतिर्जनपद०। पा० ६।३।८५। इति समानस्य सभावः। समानरूपाम्। साधुरूपाम्। अकरत्। डुकृञ् करणे लुङ् कृतवती। त्वचम्। १।२३।४। त्वचाम्, शरीरावरणं चर्म ॥
