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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
शत्रुओं से रक्षा का उपदेश।
Word-Meaning: - (वरुण) हे सबमें श्रेष्ठ, परमेश्वर ! (इतः च) इस दिशा से (च) और (अमुतः) उस दिशा से (यत् यत्) प्रत्येक (वधम्) शत्रुप्रहार को (यावय) हटा दे। (महत्) [अपनी] बड़ी (शर्म) शरण को (वि) अनेक प्रकार से (यच्छ) [हमें] दान कर और (वधम्) [शत्रुओं के] प्रहार को (वरीयः) बहुत दूर (यावय) फैंक दे ॥३॥
Connotation: - जो सेनापति ईश्वर पर विश्वास करके अपनी सेना को प्रयत्नपूर्वक शत्रु के प्रहार से बचाता और उन में वैरी को जीतने का उत्साह बढ़ाता है, वह शूरवीर जीत पाकर आनन्द पाता है ॥३॥ मन्त्र का पिछला आधा ऋ० १०।१५२।५। का दूसरा आधा है, वहाँ (महत्) के स्थान में [मन्योः] शब्द है ॥
Footnote: ३−इतः। पञ्चम्यास्तसिल्। पा० ५।३।७। इति इदम्−तसिल्। अस्मात् स्थानात्। अमुतः। अदस्−तसिल् पूर्ववत्। तस्माद् देशात्। यत् यत्। इति अव्ययद्वयम्। प्रत्येकं वधं यः कश्चिद् भवेद् इत्यर्थे। वधम्। म० २। शस्त्रप्रहारम्। वरुण। १।३।३। हे वरणीय, परमेश्वर ! यावय। म० २। वियोजय। महत्। १।१०।४। विपुलं विस्तीर्णम्। शर्म। सर्वधातुभ्यो मनिन्। उ० ४।१४५। इति शॄ हिंसायाम्−मनिन्। स्वशरणम्, सुखम्। वि। विशेषेण। यच्छ। पाघ्राध्मास्थाम्ना०। पा० ७।३।७८। इति दाण्−दाने−यच्छादेशः। देहि। वरीयः। १।२।२। उरुतरम् विस्तीर्णतरम्, दूरतरम् ॥
