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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
बुद्धि की वृद्धि के लिये उपदेश।
Word-Meaning: - [हे इन्द्र] (ज्याके) जय के लिये (नः) हमको (परि) सर्वथा (नम) तू झुका, (तन्वम्) [हमारे] शरीर को (अश्मानम्) पत्थर सा [सुदृढ़] (कृधि) बना दे। (वीडुः) तू दृढ़ होकर (अरातीः) विरोधों और (द्वेषांसि) द्वेषों को (अप=अपहृत्य) हटाकर (वरीयः) बहुत दूर (आकृधि) कर दे ॥२॥ अथवा, (ज्याके) दोनों जय के साधनों [मेघ और भूमि] को (नः परि) हमारी ओर (नम) तू झुका। यह अर्थ प्रयुक्त करो ॥
Connotation: - परमेश्वर में पूर्ण विश्वास करके मनुष्य आत्मबल और शरीरबल प्राप्त करें और सब विरोधों को मिटावें। सायणाचार्य ने अर्थ किया है कि (ज्याके) हे कुत्सित चिल्ला ! (नः) हमको (परि) छोड़ कर (नम) झुक। हमारी समझ में वह असंगत है, संपूर्ण सूक्त का देवता इन्द्र है ॥
Footnote: २−ज्याके। ज्या जयतेर्वा जिनातेर्वा प्रजावयतीषूनिति वा−निरु० ९।१७ ॥ खजेराकः। उ० ४।१३। इति जि जये-आकप्रत्ययः। निपात्यते च। सप्तम्यधिकरणे च। पा० २।३।३६। अत्र। निमित्तात् कर्मसंयोगे सप्तमी वक्तव्या। वार्तिकम्। इति निमित्ते सप्तमी। जयनिमित्ते=जयार्थम्। यद्वा १।१।३। ज्या-स्वार्थे कन्, टाप् च। जयसाधने [उभे पर्जन्यपृथिव्यौ]−स्त्रियां द्वितीयाद्विवचनम्। परि। परितः सर्वतः। नः। अस्मान्। नम। नमय, प्रह्वीकुरु। अश्मानम्। अशशकिभ्यां छन्दःसि। उ० ४।१४७। इति अशू व्याप्तौ वा अश भोजने−मनिन्। अश्मा मेघनाम−निघ० १।१०। पाषाणं, प्रस्तरवद्, दृढम्। तन्वम्। १।१।१। छन्दसि यण्। उदात्तस्वरितयोर्यणः स्वरितोऽनुदात्तस्य। पा० ८।२।४। इति स्वरितः। तनूम्, शरीरम्। कृधि। डुकृञ् करणे−लोट्। कुरु। वीडुः। भृमृशीङ्०। उ० १।७। इति वील संस्तम्भे−उ, लस्य डः। वीलु बलनाम निघ० २।९। वीलयतिश्च व्रीलयतिश्च संस्तम्भकर्माणौ। निरु० ५।१६। वीड्वी दृढा। वरीयः। प्रियस्थिरेत्यादिना। पा० ६।४।१५७। इति उरु−ईयसुन् वरादेशः। क्रियाविशेषणम्। उरुतरं दूरतरम्। अरातीः। न राति ददाति सुखं स अरातिः शत्रुः। क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम्। पा० ३।३।१७४। इति रा दाने-क्तिच्, नञ्समासः। सुपां सुलुक्पूर्वसवर्ण०। पा० ७।१।३९। इति पूर्वसवर्णः। अरातीन् शत्रून्। यद्वा क्तिन् प्रत्ययान्ते, शत्रुभावान्, विरोधान्। अप। अपहृत्य। द्वेषांसि। द्विष अप्रीतौ भावे-असुन्। द्वेषान् आ। ईषदर्थे ॥
