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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
नाडीछेदन [फ़सद् खोलने] के दृष्टान्त से दुर्वासनाओं के नाश का उपदेश।
Word-Meaning: - (अवरे) हे नीचे की [नाड़ी] (तिष्ठ) तू ठहर, (परे) हे ऊपरवाली (तिष्ठ) तू ठहर, (उत) और (मध्यमे) हे बीचवाली (त्वम्) तू (तिष्ठ) ठहर, (च) और (कनिष्ठिका) अति छोटी नाड़ी (तिष्ठति) ठहरती है, (मही) बड़ी (धमनिः) नाड़ी (इत्) भी (तिष्ठात्) ठहर जावे ॥२॥
Connotation: - १−चिकित्सक सावधानी से सब नाड़ियों को अधिक रुधिर बहने से रोक देवे ॥ २−मनुष्य अपने चित्त की वृत्तियों को ध्यान देकर कुमार्ग से हटावे और हड़बड़ी करके अपने कर्तव्य को न बिगड़ने दे किन्तु यत्नपूर्वक सिद्ध करे ॥२॥
Footnote: २−तिष्ठ। निवृत्तगतिर्भव। अवरे। १।८।३। अवर−टाप्। हे निकृष्टे। अधोभागस्थिते हिरे। परे। १।८।३। हे श्रेष्ठे, ऊर्ध्वाङ्गवर्तिनि ! त्वम्। हिरे, सिरे। मध्यमे। मध्यान्मः। पा० ४।३।८। मध्य-म प्रत्ययो भवार्थे। हे शरीरव्यवर्तिनि। कनिष्ठिका। युवाल्पयोः कनन्यतरस्याम्। पा० ५।३।६४। इति अल्प−इष्ठनि कन् आदेशः। स्वार्थे क प्रत्ययः। प्रत्ययस्थात् कात् पूर्वस्यात इदाप्यसुपः। पा० ७।३।४४। इति इत्वं टापि परतः। अल्पतमा, सूक्ष्मतरा नाडी। तिष्ठात्। ष्ठा गतिनिवृत्तौ-लेट्। लेटोऽडाटौ। पा० ३।४।९४। इति आडागमः। अवतिष्ठताम्, धमनिः। अर्त्तिसृधृधमि०। उ० २।१०२। इति धम ध्माने, ध्वाने च-अनि। सिरा, नाडी। मही। मह पूजायाम्-अच्। षिद्गौरादिभ्यश्च। पा० ४।१।४१। इति ङीप्। महती, बृहती स्थूला ॥
