Devata: पूषादयो मन्त्रोक्ताः
Rishi: अथर्वा
Chhanda: चतुष्पदा उष्णिग्गर्भा ककुम्मती अनुष्टुप्
Swara: नारीसुखप्रसूति सूक्त
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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
सृष्टिविद्या का वर्णन।
Word-Meaning: - (सूषा) सन्तान उत्पन्न करनेवाली माता (व्यूर्णोतु) अङ्गों को कोमल करे (योनिम्) प्रसूतिका गृह को (विहापयामसि) हम प्रस्तुत करते हैं। (सूषणे) हे जन्म देने हारी माता ! (त्वम्) तू (श्रथय) प्रसन्न हो। (विष्कले) हे वीर स्त्री ! (त्वम्) तू (अव सृज) [बालक को] उत्पन्न कर ॥३॥
Connotation: - गर्भ के पूरे दिनों में गर्भिणी की शारीरिक और मानसिक अवस्था को विशेष ध्यान से स्वस्थ रक्खें। माता के प्रसन्न और सुखी रहने से बालक भी प्रसन्न और सुखी होता है। प्रसूतिका गृह भी पहिले से देश, काल विचार कर प्रस्तुत रक्खें कि प्रसूता स्त्री और बालक भले प्रकार स्वस्थ और हृष्ट पुष्ट रहें ॥३॥
Footnote: ३−सूषा। सूषति प्रसवतीति। षूष, सूष वा प्रसवे-अच्, टाप्। सवित्री जननी, माता। वि+ऊर्णोतु। म० १। अङ्गानि प्रस्तुतानि करोतु। योनिम्। वहिश्रिश्रुयुद्रुग्लाहात्वरिभ्यो नित्। उ० ४।५१। इति यु मिश्रणामिश्रणयोः−नि। योनिर्गृहनाम−निघ० ३।४। गृहम्। प्रसूतिकागृहम्। वि+हापयामसि। ओहाङ् गतौ-णिच्। अर्त्तिह्री०। पा० ७।३।३६। इति पुगागमः। इदन्तो मसिः। पा० ७।१।४६। इकारः। विहापयामः। विशेषेण गमयामः। प्रस्तुतं कुर्मः। श्रथय। श्रथ यत्ने प्रहर्षे च, चुरादिः। यतस्व। हृष्टा भव। सूषणे। संपदादिभ्यः क्विप्। वा० पा० ३।३।९४। इति षूङ् प्रसवे-क्विप्। सूः सवनम्, उत्पत्तिः। छन्दसि वनसनरक्षिमथाम्। पा० ३।३।२७। इति सू+षण दाने−इन्। सुवं सनोति ददातीति सूषणिः। तत्सम्बोधनम्। हे प्रसवस्य दात्रि कारिणि ! विष्कले। कलस्तृपश्च। उ० १।१०४। इति विष्क हिंसायां दर्शने च कल प्रत्ययः। टाप्। हे वीरे, शूरे। दर्शनीये। अव+सृज। उपसर्गस्य व्यवधानम्। सृज विसर्गे। गर्भं बालकम् उत्पादय ॥
