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कृ॑त्या॒दूष॑ण ए॒वायमथो॑ अराति॒दूष॑णः। अथो॒ सह॑स्वाञ्जङ्गि॒डः प्र ण॒ आयूं॑षि तारिषत् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कृत्याऽदूषणः। एव। अयम्। अथो इति। अरातिऽदूषणः। अथो इति। सहस्वान्। जङ्गिडः। प्र। नः। आयूंषि। तारिषत् ॥३४.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:19» सूक्त:34» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सबकी रक्षा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) यह [पदार्थ] (एव) निश्चय करके (कृत्यादूषणः) पीड़ाओं का नाश करनेवाला (अथो) और भी (अरातिदूषणः) कंजूसी मिटानेवाला है। (अथो) और भी (सहस्वान्) वह महाबली (जङ्गिडः) जङ्गिड [संचार करनेवाला औषध] (नः) हमारे (आयूंषि) जीवनों को (प्र तारिषत्) बढ़ावे ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य उत्तम औषध जङ्गिड के सेवन से रोगों का नाश करके आत्मिक और शारीरिक स्वास्थ्य बढ़ावें ॥४॥
टिप्पणी: यह मन्त्र कुछ भेद से आ चुका है-अ०२।४।६॥४−(कृत्यादूषणः) पीडानां खण्डयिता (एव) (अयम्) प्रसिद्धः (अथो) अपि च (अरातिदूषणः) अदानशीलताया नाशकः (अथो) (सहस्वान्) बलवान् (जङ्गिडः) म०१। संचारक औषधविशेषः (नः) अस्माकम् (आयूंषि) जीवनानि (प्र तारिषत्) प्रवर्धयेत् ॥