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उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ हरि॑रसि हारियोज॒नो हरि॑भ्यां त्वा। हर्यो॑र्धा॒ना स्थ॑ स॒हसो॑मा॒ऽइन्द्रा॑य ॥११॥
पद पाठ

उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। हरिः॑। अ॒सि॒। हा॒रि॒यो॒ज॒न इति॑ हारिऽयोज॒नः। हरि॑ऽभ्या॒मिति॒ हरि॑ऽभ्याम्। त्वा॒। हर्य्योः॑। धा॒नाः। स्थ॒। स॒हसो॑मा इति॑ स॒हऽसो॑माः। इन्द्रा॑य ॥११॥

यजुर्वेद » अध्याय:8» मन्त्र:11


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर गृहस्थों का धर्म अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे पते ! आप (उपयामगृहीतः) गृहाश्रम के लिये ग्रहण किये हुए (असि) हैं, (हारियोजनः) घोड़ों को जोड़नेवाले सारथि के समान (हरिः) यथायोग्य गृहाश्रम के व्यवहार को चलानेवाले (असि) हैं, इस कारण (हरिभ्याम्) अच्छी शिक्षा को पाए हुए घोड़े से युक्त रथ में विराजमान (त्वा) आप की मैं सेवा करूँ। तुम लोग गृहाश्रम करनेवाले (इन्द्राय) परमैश्वर्य्य की प्राप्ति के लिये (सहसोमाः) उत्तम गुणयुक्त होकर (हर्य्योः) वेगादि गुणवाले घोड़ों को (धानाः) स्थानादिकों में स्थापन करनेवाले (स्थ) होओ ॥११॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मचर्य्य से शुद्ध शरीर सद्गुण सद्विद्या युक्त होकर विवाह की इच्छा करनेवाले कन्या और पुरुष युवावस्था को पहुँच और परस्पर एक-दूसरे के धन की उन्नति को अच्छे प्रकार देख कर विवाह करें, नहीं तो धन के अभाव में दुःख की उन्नति होती है। इसलिये उक्त गुणों से विवाह कर आनन्दित हुए प्रतिदिन ऐश्वर्य्य की उन्नति करें ॥११॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्गार्हस्थ्यधर्म्ममाह ॥

अन्वय -

(उपयामगृहीतः) उपयामाय गृहाश्रमाय गृहीतः (असि) (हरिः) हरते वहते यथायोग्यं गृहाश्रमव्यवहारान् (असि) (हारियोजनः) हरीन् योजयति यः सारथिः स हरियोजनः। हरियोजन एव हारियोजनस्तद्वत् (हरिभ्याम्) सुशिक्षिताभ्यां तुरङ्गाभ्याम् (त्वा) त्वाम् (हर्य्योः) अश्वयोः (धानाः) धारकाः, अत्र दधातेरौणादिको नः प्रत्ययः। (स्थ) भवत (सहसोमाः) सोमेन श्रेष्ठगुणसमूहेन सह वर्त्तमाना इव (इन्द्राय) परमैश्वर्य्यप्राप्तये। अयं मन्त्रः (शत०४.४.३.१-१०) व्याख्यातः ॥११॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे पते ! त्वमुपयामगृहीतोऽसि हारियोजन इव हरिरसि, अतो हरिभ्यां युक्ते स्यन्दने विराजमानं त्वा त्वामहं सेवे, यूयं गृहाश्रमिणः सन्त इन्द्राय सहसोमाः सन्तो हर्य्योर्धाना स्थ ॥११॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मचर्यसंस्कृता विवाहमिच्छवो युवतयः कन्या युवानश्चान्योऽन्यस्य धनोन्नतिं परीक्ष्य विवाहं कुर्याताम्, नो चेद्धनाभावे दुःखोन्नतिर्भवेत्। एवमुपयम्य परस्परमाह्लादयन्तः सन्तः प्रतिदिनमैश्वर्यमुन्नयेयुः ॥११॥