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ये दे॑वासो दि॒व्येका॑दश॒ स्थ पृ॑थि॒व्यामध्येका॑दश॒ स्थ। अ॒प्सु॒क्षितो॑ महि॒नैका॑दश॒ स्थ ते दे॑वासो य॒ज्ञमि॒मं जु॑षध्वम् ॥१९॥
पद पाठ

ये। दे॑वा॒सः॒। दि॒वि। एका॑दश। स्थ। पृ॒थि॒व्याम्। अधि॑। एका॑दश। स्थ। अप्सु॒क्षित॒ इत्य॑प्सु॒ऽक्षितः॑। म॒हि॒ना। एका॑दश। स्थ। ते। दे॒वा॒सः॒। य॒ज्ञम्। इ॒मम्। जु॒ष॒ध्व॒म् ॥१९॥

यजुर्वेद » अध्याय:7» मन्त्र:19


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब राजा और सभासदों के काम अगले मन्त्र में कहे हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो (महिना) अपनी महिमा से (दिवि) विद्युत् के स्वरूप में (एकादश) ग्यारह अर्थात् प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान, नाग, कूर्म्म, कृकल, देवदत, धनञ्जय और जीवात्मा (देवासः) दिव्यगुणयुक्त देव (स्थ) हैं, (पृथिव्याम्) भूमि के (अधि) ऊपर (एकादश) ग्यारह अर्थात् पृथिवी, जल, अग्नि, पवन, आकाश, आदित्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, अहंकार महत्तत्त्व और प्रकृति (स्थ) हैं तथा (अप्सुक्षितः) प्राणों में ठहरनेवाले (एकादश) ग्यारह श्रोत्र, त्वक् चक्षु, जिह्वा, नासिका, वाणी, हाथ, पाँव, गुदा, लिङ्ग और मन (स्थ) हैं, (ते) वे जैसे अपने-अपने कामों में वर्त्तमान हैं, वैसे हे (देवासः) राजसभा के सभासदो ! आप लोग यथायोग्य अपने-अपने कामों में वर्त्तमान होकर (इमम्) इस (यज्ञम्) राज और प्रजा सम्बन्धी व्यवहार का (जुषध्वम्) सेवन किया करें ॥१९॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अपने-अपने कामों में प्रवृत्त हुए अन्तरिक्षादिकों में सब पदार्थ हैं, वैसे राजसभासदों को चाहिये कि अपने-अपने न्यायमार्ग में प्रवृत्त रहें ॥१९॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ राजसभ्यजनकृत्यमाह ॥

अन्वय -

(ये) (देवासः) दिव्यगुणयुक्ताः (दिवि) विद्युति (एकादश) प्राणापानोदानव्यानसमाननागकूर्म्म- कृकलदेवदत्तधनञ्जयजीवाः (स्थ) सन्ति, अत्र पुरुषव्यत्ययः। (पृथिव्याम्) भूमौ (अधि) उपरिभावे (एकादश) पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशादित्यचन्द्रनक्षत्राहङ्कारमहत्तत्त्वप्रकृतयः (स्थ) सन्ति (अप्सुक्षितः) प्राणेषु क्षयन्ति निवसन्ति ते (महिना) महिम्ना (एकादश) श्रोत्रत्वक्चक्षूरसनाघ्राणवाक्पाणिपादपायूपस्थमनांसि (स्थ) सन्ति (ते) (देवासः) राजसभासदो विद्वांसः (यज्ञम्) राजप्रजासम्बद्धव्यवहारम् (इमम्) प्रत्यक्षम् (जुषध्वम्) सेवध्वम् ॥ अयं मन्त्रः (शत०४.२.२.९) व्याख्यातः ॥१९॥

पदार्थान्वयभाषाः - ये महिना स्वमहिम्ना दिव्येकादश देवासः स्थ सन्ति, पृथिव्यामध्येकादश स्थ सन्ति, अप्सुक्षितश्चैकादश स्थ सन्ति, ते यथा स्वस्वकर्म्मसु वर्त्तन्ते, तद्वद्वर्त्तमाना हे देवासो राजसभायाः सभ्यजना ! यूयमिमं यज्ञं जुषध्वम् ॥१९॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा स्वकर्म्मणि प्रवर्त्तमाना इमेऽन्तरिक्षादिषु पदार्थाः सन्ति, तथा सभाजनैस्स्वन्यायकर्म्मणि प्रवर्तितव्यमिति ॥१९॥