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कार्षि॑रसि समु॒द्रस्य॒ त्वा क्षि॑त्या॒ऽउन्न॑यामि। समापो॑ऽअ॒द्भिर॑ग्मत॒ समोष॑धीभि॒रोष॑धीः ॥२८॥
पद पाठ

कार्षिः॑। अ॒सि॒। स॒मु॒द्रस्य॑। त्वा। अक्षि॑त्यै। उत्। न॒या॒मि॒। सम्। आपः॑। अ॒द्भिरित्य॒त्ऽभिः। अ॒ग्म॒त॒। सम्। ओष॑धीभिः। ओष॑धीः ॥२८॥

यजुर्वेद » अध्याय:6» मन्त्र:28


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अध्यापक जन प्रत्येक जन को क्या-क्या उपदेश करे, यह अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे वैश्यजन ! तू (कार्षिः) हल जोतने योग्य (असि) है (त्वा) तुझे (समुद्रस्य) अन्तरिक्ष के (अक्षित्यै) परिपूर्ण होने के लिये (सम् उत् नयामि) अच्छे प्रकार उत्कर्ष देता हूँ, तुम सब लोग (अद्भिः) यज्ञशोधित जलों से (आपः) जल और (ओषधीभिः) ओषधियों से (ओषधीः) ओषधियों को (सम् अग्मत) प्राप्त होओ ॥२८॥
भावार्थभाषाः - क्षेत्र आदि स्थानों में अनेक ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं, ओषधियों से अग्निहोत्र आदि यज्ञ, यज्ञों से शुद्ध हुए जो जल के परमाणु ऊँचे होते हैं, उन से आकाश भरा रहता है। इस कारण विद्वान् लोग निर्बुद्धि जनों को खेती बारी ही के कामों में रखते हैं, क्योंकि वे विद्या का अभ्यास करने को समर्थ ही नहीं होते हैं ॥२७॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथाध्यापको जनः प्रतिजनं किं किमुपदिशेदित्युच्यते ॥

अन्वय -

(कार्षिः) कर्षति हलेन भूमिमिति, इञ् वपादिभ्यः। (अष्टा०भा०वा०३.३.१०८) इतीञ्। (असि) (समुद्रस्य) अन्तरिक्षस्य। समुद्र इत्यन्तरिक्षनामसु पठितम्। (निघं०१.३) (त्वा) त्वाम् (अक्षित्यै) (उत्) उत्कृष्टे (नयामि) (सम्) (आपः) जलानि (अद्भिः) जलैरेव (अग्मत) प्राप्नुत, लोडर्थे लुङ्। (सम्) (ओषधीभिः) सोमादिभिः (ओषधीः) ॥ अयं मन्त्रः (शत०३.९.३.२६-३१) व्याख्यातः ॥२८॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे वैश्यजन ! त्वं कार्षिरसि त्वां समुद्रस्याक्षित्यै समुन्नयामि, सर्वे यूयं यज्ञशोधिताभिरद्भिरेवाप ओषधीभिरोषधीः समग्मत ॥२८॥
भावार्थभाषाः - क्षेत्रादिभूमिषु नानौषधयो जायन्त, ओषधीभिरग्निहोत्रादयो यज्ञा, यज्ञैरन्तरिक्षं जलपरमाणुभिः पूर्णं भवतीति हेतोर्विद्वांसो निर्बुद्धिजनान् क्षेत्रादिषु नयन्ति, कुतस्ते विद्यामभ्यसितुं समर्था एव न भवन्तीति ॥२८॥