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ह॒विष्म॑तीरि॒माऽआपो॑ ह॒विष्माँ॒२ऽआवि॑वासति। ह॒विष्मा॑न् दे॒वोऽअ॑ध्व॒रो ह॒विष्माँ॑२ऽअस्तु॒ सूर्यः॑ ॥२३॥
पद पाठ

ह॒विष्म॑तीः। इ॒माः। आपः॑। ह॒विष्मा॑न्। आ। वि॒वा॒स॒ति॒। ह॒विष्मा॑न्। दे॒वः। अ॒ध्व॒रः। ह॒विष्मा॑न्। अ॒स्तु॒। सूर्यः॑ ॥२३॥

यजुर्वेद » अध्याय:6» मन्त्र:23


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर परस्पर मिल कर राजा और प्रजा किससे क्या-क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वान् लोगो ! तुम उन कामों को किया करो कि जिनसे (इमाः) ये (आपः) जल (हविष्मतीः) अच्छे-अच्छे दान और आदान क्रिया शुद्धि और सुख देनेवाले हों अर्थात् जिन से नाना प्रकार का उपकार दिया लिया जाय (हविष्मान्) पवन उपकार अनुपकार को (आ) अच्छे प्रकार (विवासति) प्राप्त होता है (देवः) सुख का देनेवाला (अध्वरः) यज्ञ भी (हविष्मान्) परमानन्दप्रद (सूर्य्यः) तथा सूर्यलोक भी (हविष्मान्) सुगन्धादियुक्त होके (अस्तु) हो ॥२३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस वायु जल के संयोग से अनेक सुख सिद्ध किये जाते हैं, जिनसे देश-देशान्तरों में जाने से उत्तम वस्तुओं का पहुँचाना होता है, उन अग्नि जल आदि पदार्थों से उक्त काम को क्रियाओं में चतुर पुरुष ही कर सकता है और जो नाना प्रकार की कारीगरी आदि अनेक क्रियाओं का प्रकाश करनेवाला है, वही यज्ञ वर्षा आदि उत्तम-उत्तम सुख का करनेवाला होता है ॥२३॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनरन्योन्यं मिलित्वा राजप्रजे केन किं किं कुर्यातामित्याह ॥

अन्वय -

(हविष्मतीः) प्रशस्तानि हवींषि विद्यन्ते यासु ताः (इमाः) प्रत्यक्षाः (आपः) जलानि (हविष्मान्) प्रशस्तानि हवींषि विद्यन्ते यस्य वायोः सः, दीर्घादटि समानपादे। (अष्टा०८.३.९) इति रुः। आतोऽटि नित्यम्। (अष्टा०८.३.३) इति सानुनासिकत्वम्। (आ) समन्तात् (विवासति) सेवते। विवासतीति परिचरणकर्मसु पठितम्। (निघं०३.५) (हविष्मान्) (देवः) सुखयिता। (अध्वरः) यज्ञः (हविष्मान्) (अस्तु) (सूर्यः) ॥ अयं मन्त्रः (शत०३.९.२.१०) व्याख्यातः ॥२३॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वांसः ! यथेमा आपो हविष्मतीर्हविष्मत्यः स्युरयं वायुर्हविष्मानेवाविवासति सर्वान् परिचरति, देवोऽध्वरो हविष्मान् स्यात्, सूर्यो हविष्मान् अस्तु भवेत्, तथा भवन्तो यज्ञेनैतान् शुद्धान् कुर्वन्तु ॥२३॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। येन वायुजलसंयोगेनानेकानि सुखानि साध्यन्ते, यैर्विविधदेशदेशान्तरगमनेन वस्तुप्रापणं भवति। तैरेतत् कर्म क्रियाविचक्षण एव कर्त्तुं शक्नोति, यो विविधक्रियाप्रकाशकोऽस्ति, स यज्ञो वृष्ट्यादिसुखकरो भवति ॥२३॥