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घृ॒तेना॒क्तौ प॒शूँस्त्रा॑येथा॒ रेव॑ति॒ यज॑माने प्रि॒यं धाऽआवि॑श। उ॒रोर॒न्तरि॑क्षात् स॒जूर्दे॒वेन॒ वाते॑ना॒स्य ह॒विष॒स्त्मना॑ यज॒ सम॑स्य त॒न्वा᳖ भव। वर्षो॒ वर्षी॑यसि य॒ज्ञे य॒ज्ञप॑तिं धाः॒ स्वाहा॑ दे॒वेभ्यो॑ दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥११॥
पद पाठ

घृ॒तेन॑। अ॒क्तौ। प॒शून्। त्रा॒ये॒था॒म्। रेव॑ति। यज॑माने। प्रि॒यम्। धाः॒। आ। वि॒श॒। उ॒रोः। अ॒न्तरि॑क्षात्। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वेन॑। वाते॑न। अ॒स्य। ह॒विषः॑। त्मना॑। य॒ज॒। सम्। अ॒स्य॒। त॒न्वा᳖। भ॒व॒। वर्षो॒ऽइति॒ वर्षो॒। वर्षीय॑सि। य॒ज्ञे। य॒ज्ञप॑ति॒मिति॑ य॒ज्ञऽप॑तिम्। धाः॒। स्वाहा॑। दे॒वेभ्यः॑। दे॒वेभ्यः॑। स्वाहा॑ ॥११॥

यजुर्वेद » अध्याय:6» मन्त्र:11


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब यज्ञ करने और करानेवालों के कर्त्तव्य काम का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (घृतेन, अक्तौ) घृतप्रसक्त अर्थात् घृत चाहने और यज्ञ के कराने हारो ! तुम (पशून्) गौ आदि पशुओं को (त्रायेथाम्) पालो, तुम एक एक जन (देवेन) सर्वगत (वातेन) पवन से (सजूः) समान प्रीति करते हुए (उरोः) विस्तृत (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष से उत्पन्न हुए (प्रियम्) प्रिय सुख को (रेवति) अच्छे ऐश्वर्ययुक्त (यजमाने) यज्ञ करनेवाले धनी पुरुष में (धाः) स्थापन करो तथा (आविश) उस के अभिप्राय को प्राप्त होओ और (अस्य) इस के (हविषः) होम के योग्य पदार्थ को (त्मना) आप ही निष्पादन किये हुए के समान (यज) अग्नि में होमो अर्थात् यज्ञ की किसी क्रिया का विपरीत भाव न करो और (अस्य) इसके (तन्वा) शरीर के साथ (सम्) (भव) एकीभाव रक्खो, किन्तु विरोध से द्विधा आचरण मत करो। हे (वर्षो) यज्ञकर्म से सर्वसुख के पहुँचाने वालो ! (देवेभ्यः) (स्वाहा) (देवेभ्यः) (स्वाहा) सत्कर्म के अनुष्ठान से प्रकाशित धर्मिष्ठ ज्ञानी पुरुष जो कि यज्ञ देखने की इच्छा करते हुए बार-बार यज्ञ में आते हैं, उन विद्वानों के लिये अच्छे सत्कार करानेवाली वाणियों को उच्चारण करते हुए यज्ञपति को (वर्षीयसि) सर्व सुख वर्षानेवाले यज्ञ में (धाः) अभियुक्त करो ॥११॥
भावार्थभाषाः - यज्ञ के लिये घृत आदि पदार्थ चाहनेवाले मनुष्य को गाय आदि पशु रखने चाहियें और घृतादि अच्छे-अच्छे पदार्थों से अग्निहोत्र से लेकर उत्तम यज्ञों से जल और पवन की शुद्धि कर सब प्राणियों को सुख उत्पन्न करना चाहिये ॥११॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ यज्ञकर्त्तृकारयित्रोः कर्त्तव्यमुपदिश्यते ॥

अन्वय -

(घृतेन) (अक्तौ) घृतेनासक्तचित्तौ यज्ञकर्त्ता यज्ञकारयिता च (पशून्) गवादीन् (त्रायेथाम्) रक्षेताम् (रेवति) प्रशस्तैश्वर्य्ययुक्ते (यजमाने) यज्ञानुष्ठातरि (प्रियम्) प्रसन्नतासम्पादि सुखम् (धाः) धेहि, अत्र लोडर्थे लुङ् अडभावश्च। (आ) समन्तात् (विश) (उरोः) बहोः (अन्तरिक्षात्) (सजूः) मित्रमिव (देवेन) सर्वगतेन (वातेन) वायुना सह (अस्य) (हविषः) होतव्यस्य, कर्मणि षष्ठी। (त्मना) आत्मना (यज) सङ्गच्छस्व एकीभव (सम्) (अस्य) (तन्वा) (भव) (वर्षो) यज्ञकर्म्मणा सर्वसुखसेचक ! (वर्षीयसि) सर्वसुखमभिवर्षति (यज्ञपतिम्) यज्ञपालकम् (धाः) धेहि (स्वाहा) सत्कृत्यनुकूलाम् (देवेभ्यः) दीव्यन्ति प्रकाशन्ते सत्कर्म्मानुष्ठानेन ये तेभ्यो धर्म्मिष्ठेभ्यो विद्वद्भ्यः (देवेभ्यः) शुभेभ्यो गुणेभ्यः (स्वाहा) सत्कृत्यनुरूपाम् ॥ अयं मन्त्रः (शत०३.८.१.५-१६) व्याख्यातः ॥११॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे यज्ञकर्तृकारयितारौ घृतनेनाक्तौ घृतमनस्कौ युवां पशून् त्रायेथाम्, त्वमेकैकौ देवेन वातेन सजूरुरोन्तरिक्षात् प्रियं प्रेमोत्पादकं सुखं रेवति यजमाने धा आविश तत्स्वान्तवृत्तिमाप्नुहि, अस्य हविषस्त्मना आत्मना यज, अस्य तन्वा सम्भवैकीभव न द्वैधमाचर। हे वर्षो ! यज्ञकर्मणा सुखसेचकं त्वं देवेभ्यः स्वाहा देवेभ्यः स्वाहा तद्यज्ञं दिदृक्षुभ्यः पुनः पुनरागतेभ्यो विद्वद्भ्योऽसकृत् सत्कृत्यनुरूपां वाचमुदीरयन् वर्षीयसि यज्ञे यज्ञपतिं धाः ॥११॥
भावार्थभाषाः - यज्ञार्थं घृतादिमभीप्सुभिर्मनुष्यैः पशवो रक्षणीया घृतादिसद्द्रव्येणाग्निहोत्रादियज्ञान् सम्पाद्य तैर्जलवायू संशोध्य सर्वेषां प्राणिनामभीष्टं संसाध्यम् ॥११॥