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काव्य॑योरा॒जाने॑षु॒ क्रत्वा॒ दक्ष॑स्य दुरो॒णे। रि॒शाद॑सा स॒धस्थ॒ऽआ ॥७२ ॥

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पद पाठ

काव्य॑योः। आ॒जाने॒ष्वित्या॒ऽजाने॑षु। क्रत्वा॑। दक्ष॑स्य। दु॒रो॒णे। रि॒शाद॑सा। स॒धस्थ॒ इति॑ स॒धऽस्थे॑। आ ॥७२ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:33» मन्त्र:72


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अध्यापक और उपदेशक के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (रिशादसा) अविद्यादि दोषों के नाशक अध्यापक उपदेशक लोगो ! (काव्ययोः) कवि विद्वानों ने बनाये व्यवहार परमार्थ के प्रतिपादक ग्रन्थों के (आजानेषु) जिनसे विद्वान् होते उन पठन-पाठनादि व्यवहारों में (क्रत्वा) बुद्धि से वा कर्म करके (दक्षस्य) कुशल पुरुष के (सधस्थे) जिसमें साथ मिल कर बैठें, उस (दुरोणे) घर में तुम लोग (आ) आया करो ॥७२ ॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जो अध्यापक तथा उपदेशक लोग राजा-प्रजा जनों को बुद्धिमान्, बलयुक्त, नीरोग, आपस में प्रीतिवाले, धर्मात्मा और पुरुषार्थी करें, वे पिता के तुल्य सत्कार करने योग्य हैं ॥७२ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथाऽध्यापकोपदेशकविषयमाह ॥

अन्वय:

(काव्ययोः) कविभिर्विद्वद्भिर्निर्मितयोर्व्यवहारपरमार्थप्रतिपादकयोर्ग्रन्थयोः (आजानेषु) समन्ताज्जायन्ते विद्वांसो यैस्तेषु पठनपाठनादिव्यवहारेषु (क्रत्वा) प्रज्ञया कर्मणा वा (दक्षस्य) कुशलस्य जनस्य (दुरोणे) गृहे (रिशादसा) अविद्यादिदोषनाशकावध्यापकोपदैशकौ (सधस्थे) सह तिष्ठन्ति यत्र (आ) समन्तात् ॥७२ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे रिशादसा ! काव्ययो राजानेषु क्रत्वा दक्षस्य सधस्थे दुरोणे युवामागच्छतम् ॥७२ ॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्याः ! यावध्यापकोपदेशकौ राजप्रजाजनान् प्राज्ञान् बलयुक्तानरोगान् परस्परस्मिन् प्रीतिमतो धर्मात्मनः पुरुषार्थिनः संपादयेतां तौ पितृवत् सत्कर्तव्यौ स्तः ॥७२ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो ! जे अध्यापक व उपदेशक राजा व प्रजा यांना बुद्धिमान, बलवान, निरोगी, प्रेमळ, धर्मात्मा व पुरुषार्थी करतात त्यांचा पित्याप्रमाणे सत्कार करावा.