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जनि॑ष्ठाऽउ॒ग्रः सह॑से तु॒राय॑ म॒न्द्रऽओजि॑ष्ठो बहु॒लाभि॑मानः। अव॑र्द्ध॒न्निन्द्रं॑ म॒रुत॑श्चि॒दत्र॑ मा॒ता यद्वी॒रं द॒धन॒द्धनि॑ष्ठा ॥६४ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

जनि॑ष्ठाः। उ॒ग्रः। सह॑से। तु॒राय॑। म॒न्द्रः। ओजि॑ष्ठः। ब॒हु॒लाभि॑मान॒ इति॑ ब॒हु॒लऽअ॑भिमानः ॥ अव॑र्द्धन्। इन्द्र॑म्। म॒रुतः॑। चि॒त्। अत्र॑। मा॒ता। यत्। वी॒रम्। द॒धन॑त्। धनि॑ष्ठा ॥६४ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:33» मन्त्र:64


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजन् ! (धनिष्ठा) अत्यन्त धनवती (माता) (यत्) जिस (वीरम्) शूरतादि गुणयुक्त आप पुत्र को (दधनत्) पुष्ट करती रही और (चित्) जैसे (इन्द्रम्) सूर्य्य को (मरुतः) वायु बढ़ावे, वैसे सभासद् लोग जिस आपको (अवर्द्धन्) योग्यतादि से बढ़ावें सो आप (अत्र) इस राज्यपालनरूप व्यवहार में (सहसे) बल और (तुराय) शीघ्रता के लिये (उग्रः) तेजस्वि स्वभाववाले (मन्द्रः) स्तुति प्रशंसा को प्राप्त आनन्ददाता (ओजिष्ठः) अतिशय पराक्रमी और (बहुलाभिमानः) अनेक प्रकार के पदार्थों के अभिमानवाले हुए सुख को (जनिष्ठाः) उत्पन्न कीजिये ॥६४ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो स्वयं ब्रह्मचर्य से शरीरात्मबलयुक्त विद्वान् हुआ दुष्टों के प्रति कठिन स्वभाववाला, श्रेष्ठ के विषय (में) भिन्न स्वभाववाला होता हुआ बहुत उत्तम सभ्यों से युक्त धर्मात्मा हुआ न्याय और विनय से राज्य की रक्षा करे, वह सब ओर से बढ़े ॥६४ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

(जनिष्ठाः) जनयेः। अत्र लुङ्यडभावः। (उग्रः) तेजस्विस्वभावः (सहसे) बलाय (तुराय) शीघ्रत्वाय (मन्द्रः) स्तुत आनन्दप्रदः (ओजिष्ठः) अतिशयेन ओजस्वी (बहुलाभिमानः) बहुलो बहुविधोऽभिमानो यस्य सः (अवर्द्धन्) (इन्द्रम्) सूर्य्यम् (मरुतः) वायवः (चित्) इव (अत्र) अस्मिन् राज्यपालनव्यवहारे (माता) जननी (यत्) यम् (वीरम्) शौर्यादिगुणयुक्तं पुत्रम् (दधनत्) अपोषयत्। अनकारागमश्छान्दसः। (धनिष्ठा) अतिशयेन धनिनी ॥६४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजन् ! धनिष्ठा माता यद्वीरं दधनदिन्द्रं मरुतश्चिदिव सभ्या यं त्वामवर्धयन्त्स त्वमत्र सहसे तुराय उग्रो मन्द्र ओजिष्ठो बहुलाभिमानः सन् सुखं जनिष्ठाः ॥६४ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। यः स्वयं ब्रह्मचर्य्येण शरीरात्मबलयुक्तो विद्वान् स दुष्टान् प्रत्युग्रः कठिनस्वभावः श्रेष्ठे सोऽन्यस्वभावः सन् बहुसुसभ्यावृतो धर्मात्मा भूत्वा न्यायविनयाभ्यां राज्यं पालयेत्, स सर्वतोऽभिवर्द्धेत ॥६४ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जो स्वः ब्रह्मचर्य पालन करून शरीर व आत्मा बलवान करून विद्वान बनतो आणि दुष्टांबरोबर उग्र व श्रेष्ठ लोकांबरोबर कोमलपणाने वागतो व सभ्य, धर्मात्मा, न्यायी बनून नम्रपणे राज्याचे रक्षण करतो त्याची सर्व प्रकारे उन्नती होते.