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त्रि॒ꣳश॒द्धाम॒ विरा॑जति॒ वाक् प॑त॒ङ्गाय॑ धीयते। प्रति॒ वस्तो॒रह॒ द्युभिः॑ ॥८॥
पद पाठ

त्रि॒ꣳशत्। धाम॑। वि। रा॒ज॒ति॒। वाक्। प॒त॒ङ्गाय॑। धी॒य॒ते॒। प्रति॑। वस्तोः॑। अह॑। द्युभि॒रिति॒ द्युऽभिः॑ ॥८॥

यजुर्वेद » अध्याय:3» मन्त्र:8


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - मनुष्यों को जो अग्नि (द्युभिः) प्रकाश आदि गुणों से (प्रतिवस्तोः) प्रतिदिन (त्रिंशत्) अन्तरिक्ष, आदित्य और अग्नि को छोड़ के पृथिवी आदि को जो तीस (धाम) स्थान हैं, उनको (विराजति) प्रकाशित करता है, उस (पतङ्गाय) चलने-चलाने आदि गुणों से प्रकाशयुक्त अग्नि के लिये (प्रतिवस्तोः) प्रतिदिन विद्वानों को (अह) अच्छे प्रकार (वाक्) वाणी (धीयते) अवश्य धारण करनी चाहिये ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो वाणी प्राणयुक्त शरीर में रहनेवाले बिजुलीरूप अग्नि से प्रकाशित होती है, उसके गुणों के प्रकाश के लिये विद्वानों को उपदेश वा श्रवण नित्य करना चाहिये ॥८॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

अन्वय -

(त्रिंशत्) पृथिव्यादीनि त्रयस्त्रिंशतो वस्वादीनां देवानां मध्ये पठितानि। अन्तरिक्षमादित्यमग्निं च विहाय त्रिंशत्संख्याकानि (धाम) दधति येषु तानि धामानि। अत्र सुपां सुलुग्० [अष्टा०७.१.३९] इति शसो लुक्। (वि) विशेषार्थे (राजति) प्रकाशयति, अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः। (वाक्) उच्यते यया सा। वागिति वाङ्नामसु पठितम्। (निघं०१.११) (पतङ्गाय) पतति गच्छतीति पतङ्गस्तस्मा अग्नये (धीयते) धार्यताम् (प्रति) वीप्सायाम् (वस्तोः) दिनं दिनम्। वस्तोरित्यहर्नामसु पठितम्। (निघं०१.९) (अह) विनिग्रहार्थे। अह इति विनिग्रहार्थीयः। (निरु०१.५) (द्युभिः) प्रकाशादिगुणविशेषैः। दिवो द्योतनकर्मणामादित्यरश्मीनाम्। (निरु०१३.२५) ॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - मनुष्यैर्योऽग्निर्द्युभिः प्रतिवस्तोस्त्रिंशद्धाम धामानि विराजति प्रकाशयति, तस्मै पतङ्गाय पतनपातनादिगुणप्रकाशिताय प्रतिवस्तोः प्रतिदिनं विद्वद्भिरह वाग्धीयताम् ॥८॥
भावार्थभाषाः - या वाणी प्राणयुक्तेन शरीरस्थेन विद्युदाख्येनाग्निना नित्यं प्रकाश्यते, सा तद् गुणप्रकाशाय विद्वद्भिर्नित्यमुपदेष्टव्या श्रोतव्या चेति ॥८॥