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आया॒त्विन्द्रोऽव॑स॒ऽउप॑ नऽइ॒ह स्तु॒तः स॑ध॒माद॑स्तु॒ शूरः॑। वा॒वृ॒धा॒नस्तवि॑षी॒र्यस्य॑ पू॒र्वीर्द्यौर्न क्ष॒त्रम॒भिभू॑ति॒ पुष्या॑त् ॥४७ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। या॒तु॒। इन्द्रः॑। अव॑से। उप॑। नः॒। इ॒ह। स्तु॒तः। स॒ध॒मादिति॑ सध॒ऽमात्। अ॒स्तु॒। शूरः॑। वा॒वृ॒धा॒नः। व॒वृ॒धा॒नऽइति॑ ववृधा॒नः। तवि॑षीः। यस्य॑। पू॒र्वीः। द्यौः। न। क्ष॒त्रम्। अ॒भिभूतीत्य॒भिऽभू॑ति। पुष्या॑त् ॥४७ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:20» मन्त्र:47


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब राजधर्मविषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - जो (इन्द्रः) परमैश्वर्य का धारण करनेहारा (इह) इस वर्त्तमान काल में (स्तुतः) प्रशंसा को प्राप्त हुआ (शूरः) निर्भय वीर पुरुष (पूर्वीः) पूर्व विद्वानों ने अच्छी शिक्षा से उत्तम की हुई (तविषीः) सेनाओं को (वावृधानः) अत्यन्त बढ़ानेहारा जन (यस्य) जिस का (अभिभूति) शत्रुओं का तिरस्कार करनेहारा (क्षत्रम्) राज्य (द्यौः) सूर्य के प्रकाश के (न) समान वर्त्तता है जो (नः) हम को (पुष्यात्) पुष्ट करे वह हमारे (अवसे) रक्षा आदि के लिये (उप, आ, यातु) समीप प्राप्त होवे और (सधमात्) समान स्थानवाला (अस्तु) होवे ॥४७ ॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य सूर्य के समान न्याय और विद्या दोनों के प्रकाश करनेहारे, सत्कृत हर्ष और पुष्टि से युक्त सेनावाले, प्रजा की पुष्टि और दुष्टों का नाश करनेहारे हों, वे राज्याधिकारी होवें ॥४७ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ राजधर्मविषयमाह ॥

अन्वय:

(आ) (यातु) आगच्छतु (इन्द्रः) परमैश्वर्यधारकः (अवसे) रक्षणाद्याय (उप) (नः) अस्मान् (इह) अस्मिन् काले (स्तुतः) प्रशंसितः (सधमात्) समानस्थानात् (अस्तु) (शूरः) (वावृधानः) अत्यन्तं वर्द्धयमानो जनः (तविषीः) सेनाः (यस्य) (पूर्वीः) पूर्वैर्विद्वद्भिः सुशिक्षायोत्तमाः कृताः (द्यौः) सूर्यप्रकाशः (न) इव (क्षत्रम्) राज्यम् (अभिभूति) शत्रूणामभिभवकर्त्री (पुष्यात्) पुष्टङ्कुर्यात् ॥४७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - य इन्द्र इह स्तुतः शूरः पूर्वीस्तविषीर्वावृधानो यस्याभिभूति क्षत्रं द्यौर्न वर्त्तते, यो नः पुष्यात् सोऽस्माकमवस उपायातु सधमादस्तु ॥४७ ॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्याः सूर्यवत् न्यायविद्योभयप्रकाशकाः सत्कृतहृष्टपुष्टसेनाः प्रजापोषका दुष्टविनाशकाः स्युस्ते राज्याधिकारिणः सन्तु ॥४७ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे सूर्यासारखी न्यायदक्ष व विद्येचा प्रसार, प्रचार करण्यास सक्षम असून, सुसज्जित सेनेने प्रजेचे रक्षण करतात आणि दुष्टांचा नायनाट करतात त्यांनीच राज्याधिकारी बनावे.