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अ॒पां फेने॑न॒ नमु॑चेः॒ शिर॑ऽइ॒न्द्रोद॑वर्त्तयः। विश्वा॒ यदज॑यः॒ स्पृधः॑ ॥७१ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒पाम्। फेने॑न। नमु॑चेः। शिरः॑। इ॒न्द्र॒। उत्। अ॒व॒र्त्त॒यः॒। विश्वाः॑। यत्। अज॑यः। स्पृधः॑ ॥७१ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:19» मन्त्र:71


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब सेनापति कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्द्र) सूर्य्य के समान वर्त्तमान सेनापते ! जैसे सूर्य (अपाम्) जलों की (फेनेन) वृद्धि से (नमुचेः) अपने स्वरूप को न छोड़नेवाले मेघ के (शिरः) घनाकार बद्दलों को काटता है, वैसे ही तू अपनी सेनाओं को (उदवर्त्तयः) उत्कृष्टता को प्राप्त कर (यत्) जो (विश्वाः) सब (स्पृधः) स्पर्द्धा करनेहारी शत्रुओं की सेना हैं, उन को (अजयः) जीत ॥७१ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य से आच्छादित भी मेघ वारंवार उठता है, वैसे ही वे शत्रु भी वारंवार उत्थान करते हैं। वे जब तक अपने बल को न्यून और दूसरों का बल अधिक देखते हैं, तब तक शान्त रहते हैं ॥७१ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ सेनेशः कीदृशः स्यादित्याह ॥

अन्वय:

(अपाम्) जलानाम् (फेनेन) वर्द्धनेन (नमुचेः) योऽपः स्वस्वरूपं न मुञ्चति तस्य मेघस्य (शिरः) घनाकारमुपरिभागम् (इन्द्र) सूर्य इव वर्त्तमान सेनेश (उत्) (अवर्त्तयः) ऊर्ध्वं वर्त्तय (विश्वाः) अखिलाः (यत्) याः (अजयः) जय (स्पृधः) याः स्पर्द्धन्ते ताः शत्रुसेनाः ॥७१ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र ! यथा सूर्योऽपां फेनेन नमुचेर्मेघस्य शिरश्छिनत्ति, तथैव त्वं स्वकीयाः सेना उदवर्त्तयो यद्या विश्वाः स्पृधः सन्ति, ता अजयः ॥७१ ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्येणाच्छादितोऽपि मेघः पुनः पुनरुत्तिष्ठति, तथैव ते शत्रवोऽपि पुनः पुनरुत्थानं कुर्वन्ति, ते यावत् स्वं बलं न्यूनं परेषामधिकं च पश्यन्ति, तावच्छान्ता वर्त्तन्ते ॥७१ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. ज्याप्रमाणे सूर्याने आच्छादित केले तरी मेघ वारंवार आकाश व्यापतात. त्याप्रमाणे शत्रूही वारंवार डोके वर काढतो. जोपर्यंत त्यांचे बल कमी व दुसऱ्याचे बल जास्त असते तोपर्यंत ते शांत राहतात.