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अ॒जो ह्य॒ग्नेरज॑निष्ट॒ शोका॒त् सोऽ अ॑पश्यज्जनि॒तार॒मग्रे॑। तेन॑ दे॒वा दे॒वता॒मग्र॑मायँ॒स्तेन॒ रोह॑माय॒न्नुप॒ मेध्या॑सः। श॒र॒भमा॑र॒ण्यमनु॑ ते दिशामि॒ तेन॑ चिन्वा॒नस्त॒न्वो᳕ निषी॑द। श॒र॒भं ते॒ शुगृ॑च्छतु॒ यं द्वि॒ष्मस्तं ते॒ शुगृ॑च्छतु ॥५१ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒जः। हि। अ॒ग्नेः। अज॑निष्ट। शोका॑त्। सः। अ॒प॒श्य॒त्। ज॒नि॒तार॑म्। अग्रे॑। तेन॑। दे॒वाः। दे॒वता॑म्। अग्र॑म्। आ॒य॒न्। तेन॑। रोह॑म्। आ॒य॒न्। उप॑। मेध्या॑सः। श॒र॒भम्। आ॒र॒ण्यम्। अनु॑। ते॒। दि॒शा॒मि॒। तेन॑। चि॒न्वा॒नः। त॒न्वः᳖। नि। सी॒द॒। श॒र॒भम्। ते॒। शुक्। ऋ॒च्छ॒तु॒। यम्। द्वि॒ष्मः। तम्। ते॒। शुक्। ऋ॒च्छ॒तु॒ ॥५१ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:13» मन्त्र:51


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्यों को कौन से पशु न मारने और कौन से मारने चाहियें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजन् ! तू जो (हि) निश्चित (अजः) बकरा (अजनिष्ट) उत्पन्न होता है, (सः) वह (अग्रे) प्रथम (जनितारम्) उत्पादक को (अपश्यत्) देखता है, जिससे (मेध्यासः) पवित्र हुए (देवाः) विद्वान् (अग्रम्) उत्तम सुख और (देवताम्) दिव्यगुणों के (उपायन्) उपाय को प्राप्त होते हैं और जिससे (रोहम्) वृद्धियुक्त प्रसिद्धि को (आयन्) प्राप्त होवें, (तेन) उससे उत्तम गुणों, उत्तम सुख तथा (तेन) उससे वृद्धि को प्राप्त हो। जो (आरण्यम्) बनैली (शरभम्) शेही (ते) तेरी प्रजा को हानि देनेवाली है, उसको (अनुदिशामि) बतलाता हूँ, (तेन) उससे बचाए हुए पदार्थ से (चिन्वानः) बढ़ता हुआ (तन्वः) शरीर में (निषीद) निवास कर और (तम्) उस (शरभम्) शल्यकी को (ते) तेरा (शुक्) शोक (ऋच्छतु) प्राप्त हो और (ते) तेरे (यम्) जिस शत्रु से हम लोग (द्विष्मः) द्वेष करें, उसको (शोकात्) शोकरूप (अग्नेः) अग्नि से (शुक्) शोक अर्थात् शोक से बढ़कर शोक अत्यन्त शोक (ऋच्छतु) प्राप्त होवे ॥५१ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को उचित है कि बकरे और मोर आदि श्रेष्ठ पशु पक्षियों को न मारें और इनकी रक्षा कर के उपकार के लिये संयुक्त करें और जो अच्छे पशुओं और पक्षियों के मारनेवाले हों, उनको शीघ्र ताड़ना देवें। हाँ, जो खेती को उजाड़ने हारे श्याही आदि पशु हैं, उन को प्रजा की रक्षा के लिये मारें ॥५१ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्यैः के पशवो न हन्तव्याः के च हन्तव्या इत्याह ॥

अन्वय:

(अजः) छागः (हि) खलु (अग्नेः) पावकात् (अजनिष्ट) जायते (शोकात्) (सः) (अपश्यत्) पश्यति (जनितारम्) उत्पादकम् (अग्रे) (तेन) (देवाः) विद्वांसः (देवताम्) दिव्यगुणताम् (अग्रम्) उत्तमं सुखम् (आयन्) यन्ति प्राप्नुवन्ति (तेन) (रोहम्) प्रादुर्भावम् (आयन्) प्राप्नुवन्तु (उप) (मेध्यासः) पवित्राः सन्तः (शरभम्) शल्यकम् (आरण्यम्) जंगलोत्पन्नम् (अनु) (ते) (दिशामि) (तेन) (चिन्वानः) अग्रे पूर्ववत्। [अयं मन्त्रः शत०७.५.२.३६ व्याख्यातः] ॥५१ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजंस्त्वं यो ह्यजोऽजनिष्ट सोऽग्रे जनितारमपश्यत्, येन मेध्यासो देवा अग्रं देवतां सुखमुपायन्, येन रोहमुपायन्, तेनोत्तमगुणतामग्रं सुखं तेन वृद्धिं च प्राप्नुहि। यमारण्यं शरभं तेऽनुदिशामि तेन चिन्वानः संस्तन्वो निषीद। तं शरभं ते शुगृच्छतु, यं ते तवारिं वयं द्विष्मस्तं शोकादग्नेः शुगृच्छतु ॥५१ ॥
भावार्थभाषाः - राजजनैरजादीनहत्वा संरक्ष्यैते उपकाराय संयोजनीयाः। ये शुभपशुपक्षिहिंसका भवेयुस्ते भृशं ताडनीयाः। यदि शल्यकी हानिकारिका स्यात्, तर्हि सा प्रजापालनाय हन्तव्या ॥५१ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - शेळी, मोर इत्यादी चांगल्या पशूंना, पक्ष्यांना माणसांनी मारू नये. त्यांचे रक्षण करून त्यांचा लाभ करून घ्यावा. जे चांगल्या पशू पक्ष्यांना मारतात त्यांना ताबडतोब शिक्षा करावी. शेतीची नासाडी करणाऱ्या पशूंना मारावे. कारण त्यामुळे प्रजेचे रक्षण होते.