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आ ते॑ व॒त्सो मनो॑ यमत् पर॒माच्चि॑त् स॒धस्था॑त्। अग्ने॒ त्वाङ्का॑मया गि॒रा ॥११५ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। ते॒। व॒त्सः। मनः॑। य॒म॒त्। प॒र॒मात्। चि॒त्। स॒धस्था॒दिति॑ स॒धऽस्था॑त्। अग्ने॑। त्वाङ्का॑म॒येति॒ त्वाम्ऽका॑मया। गि॒रा ॥११५ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:12» मन्त्र:115


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्य लोग किस-किस को वश में करके आनन्द को प्राप्त होवें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्वी विद्वान् पुरुष ! (त्वाङ्कामया) तुझको कामना करने के हेतु (गिरा) वाणी से जिस (ते) तेरा (मनः) चित्त जैसे (परमात्) अच्छे (सधस्थात्) एक से स्थान से (चित्) भी (वत्सः) बछड़ा गौ को प्राप्त होवे, वैसे (आ, यमत्) स्थिर होता है, सो तू मुक्ति को क्यों न प्राप्त होवे ॥११५ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि मन और वाणी को सदैव अपने वश में रक्खें ॥११५ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्याः किं किं वशीकृत्यानन्दं प्राप्नुवन्त्वित्याह ॥

अन्वय:

(आ) (ते) तव (वत्सः) (मनः) चित्तम् (यमत्) उपरमेत् (परमात्) उत्कृष्टात् (चित्) अपि (सधस्थात्) समानस्थानात् (अग्ने) विद्वन् (त्वाङ्कामया) यया त्वां कामयते तया, अत्र द्वितीयैकवचनस्यालुक् (गिरा)। [अयं मन्त्रः शत०७.३.२.८ व्याख्यातः] ॥११५ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने सोम ! विद्वँस्त्वाङ्कामया गिरा यस्य ते मनः परमात् सधस्थाच्चिद् वत्सो गोरिवायमत्, स त्वं मुक्तिं कथन्नाप्नुयाः ॥११५ ॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैः सदैव मनः स्ववशं विधेयं वाणी च ॥११५ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - (सर्व) माणसांनी आपले मन व वाणी सदैव ताब्यात ठेवावी.