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आ꣡ प꣢वस्व म꣣ही꣢꣫मिषं꣣ गो꣡म꣢दिन्दो꣣ हि꣡र꣢ण्यवत् । अ꣡श्व꣢वत्सोम वी꣣र꣡व꣢त् ॥८९५॥

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स्वर-रहित-मन्त्र

आ पवस्व महीमिषं गोमदिन्दो हिरण्यवत् । अश्ववत्सोम वीरवत् ॥८९५॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । प꣣वस्व । मही꣢म् । इ꣡ष꣢꣯म् । गो꣡म꣢꣯त् । इ꣣न्दो । हि꣡र꣢꣯ण्यवत् । अ꣡श्व꣢꣯वत् । सो꣣म । वीरव꣡त्꣢ ॥८९५॥

सामवेद » - उत्तरार्चिकः » मन्त्र संख्या - 895 | (कौथोम) 3 » 1 » 3 » 4 | (रानायाणीय) 5 » 1 » 3 » 4


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हिन्दी : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अगले मन्त्र में पुनः उन्हीं का विषय वर्णित है।

पदार्थान्वयभाषाः -

हे (इन्दो) दीप्तिमान्, ज्ञानरस से भिगोनेवाले (सोम) प्रेरक परमात्मन् वा आचार्य ! आप हमारे लिए (गोमत्) श्रेष्ठ गाय से युक्त वा श्रेष्ठ वाणी से युक्त, (हिरण्यवत्) सुर्वण से युक्त, ज्योति से युक्त वा यश से युक्त, (अश्ववत्) घोड़ों से युक्त वा प्राणों से युक्त, (वीरवत्) वीर पुत्रों से युक्त वा वीरभावों से युक्त, (महीम्) बड़ी (इषम्) इच्छासिद्धि को (आ पवस्व) प्राप्त कराइये ॥४॥

भावार्थभाषाः -

परमात्मा और आचार्य की कृपा से विद्यावान् होकर हम सब प्रकार की लौकिक और आध्यात्मिक सम्पत्ति प्राप्त करके सुखी होवें ॥४॥

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संस्कृत : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अथ पुनस्तयोरेव विषयं प्राह।

पदार्थान्वयभाषाः -

हे (इन्दो) दीप्तिमन् ज्ञानरसेन क्लेदक (सोम) प्रेरक परमात्मन् आचार्य वा ! त्वम् अस्मभ्यम् (गोमत्) प्रशस्तधेनुयुक्तां यशोयुक्तां वा, (हिरण्यवत्) सुवर्णयुक्तां, ज्योतिर्युक्तां, यशोयुक्तां वा (अश्ववत्) तुरगयुक्तां प्राणयुक्तां वा, (वीरवत्) वीरपुत्रैर्युक्तां वीरभावैर्युक्तां वा (महीम्) महतीम् (इषम्) इच्छासिद्धिम् (आ पवस्व) आ प्रापय ॥४॥

भावार्थभाषाः -

परमात्मन आचार्यस्य च कृपया विद्यावन्तो भूत्वा वयं सर्वविधां लौकिकीमाध्यात्मिकीं च सम्पदं प्राप्य सुखिनो भवेम ॥४॥

टिप्पणी: १. ऋ० ९।४१।४, ‘अश्वा॑व॒द् वाज॑वत् सुतः’ इति तृतीयः पादः।