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क꣣दा꣡ व꣢सो स्तो꣣त्रं꣡ हर्य꣢꣯त आ꣡ अव꣢꣯ श्म꣣शा꣡ रु꣢ध꣣द्वाः꣢ । दी꣣र्घ꣢ꣳ सु꣣तं꣢ वा꣣ता꣡प्या꣢य ॥२२८॥

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स्वर-रहित-मन्त्र

कदा वसो स्तोत्रं हर्यत आ अव श्मशा रुधद्वाः । दीर्घꣳ सुतं वाताप्याय ॥२२८॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

क꣣दा꣢ । व꣣सो । स्तोत्र꣢म् । ह꣡र्य꣢꣯ते । आ । अ꣡व꣢꣯ । श्म꣣शा꣢ । रु꣣धत् । वा꣡रिति꣢दी꣣र्घ꣢म् । सु꣣त꣢म् । वा꣣ता꣡प्या꣢य । वा꣣त । आ꣡प्या꣢꣯य ॥२२८॥

सामवेद » - पूर्वार्चिकः » मन्त्र संख्या - 228 | (कौथोम) 3 » 1 » 4 » 6 | (रानायाणीय) 2 » 12 » 6


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हिन्दी : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अगले मन्त्र में भौतिक तथा दिव्य वर्षा की कामना करता हुआ कोई कह रहा है।

पदार्थान्वयभाषाः -

प्रथम—भौतिक वर्षा के पक्ष में। बहुत समय तक वर्षा न होने पर जल के अभाव से पीड़ित मनुष्य कहता है—हे (वसो) निवासप्रद इन्द्र जगदीश्वर ! वर्षा के लिए (स्तोत्रम्) स्तोत्र को (हर्यते) आपके प्रति पहुँचाते हुए मेरे लिए (कदा) कब (श्मशा) वर्षाजल से परिपूर्ण नदी या नहर (वाः) जल को (आ अवरुधत्) लाकर खेत, जलाशय आदि में रोकेगी? मैनें (वाताप्याय) वर्षा-जल के लिए (दीर्घम्) लम्बे समय तक (सुतम्) वृष्टियज्ञ किया है ॥ द्वितीय—अध्यात्म-वर्षा के पक्ष में। दिव्य आनन्दरस से परिपूर्ण परमेश्वर के पास से आनन्दरस की वर्षा की कामना करता हुआ साधक कह रहा है—हे (वसो) मुझ निर्धन के धन, निवासदाता जगदीश्वर ! आनन्दरस की वर्षा के लिए (स्तोत्रम्) स्तुति को (हर्यते) आपके प्रति पहुँचाते हुए मेरे लिए (कदा) कब (श्मशा) आपके पास से बहती हुई आनन्दरस की धारा (वाः) आनन्दरस को (आ अवरुधत्) लाकर मेरे हृदयरूप क्षेत्र या जलाशय में रोकेगी? हे रसागार ! चिरकालीन दुःख के दावानल से दग्ध मैंने (वाताप्याय) दिव्य आनन्द-जल की वर्षा के लिए (दीर्घम्) लम्बे समय तक (सुतम्) श्रद्धारस प्रस्रुत करते हुए अध्यात्म-यज्ञ निष्पन्न किया है। तो भी आनन्द-रस की वर्षा मुझे क्यों नहीं प्राप्त हो रही है? ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥

भावार्थभाषाः -

जैसे अनावृष्टि होनेपर वर्षा के लिए लम्बा वृष्टि-यज्ञ किया जाता है, वैसे ही आनन्द-रस का प्यासा मैं आनन्द-रस की वर्षा को पाने के लिए दीर्घ ध्यान-यज्ञ चिरकाल से कर रहा हूँ। तो भी हे प्रभो, क्यों आप आनन्द-वारि नहीं बरसा रहे हैं? बरसाओ, बरसाओ, हे देव, दिव्य आनन्द को बरसाओ। नहीं तो अनेक प्रकार से सांसारिक संतापों से संतप्त हुआ मैं जीवन धारण भी नहीं कर सकूँगा ॥६॥

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संस्कृत : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अथ भौतिकीं दिव्यां च वृष्टिं कामयमानः कश्चिदाह।

पदार्थान्वयभाषाः -

प्रथमः—भौतिकवृष्टिपरः। चिरकालीनवृष्टिव्युपरमे सति जलाभावपीडितः कश्चिदाह। हे (वसो) निवासप्रद इन्द्र जगदीश्वर ! वृष्ट्यर्थम् (स्तोत्रम्) स्तोमम् (हर्यते) त्वां प्रति गमयते मह्यम्। हर्य गतिकान्त्योः शतरि चतुर्थ्येकवचने रूपम्। (कदा) कस्मिन् काले (श्मशा२) वृष्ट्युदकपूर्णा नदी कुल्या वा। श्मशा शु अश्नुते इति वा, श्म अश्नुते इति वा। निरु० ५।१२। (वाः) उदकम् (आ अवरुधत्) आनीय क्षेत्रजलाशयादौ अवरोत्स्यति। रुधिर् आवरणे धातोर्लेटि रूपम्। मया (वाताप्याय३) उदकाय। वाताप्यम् उदकं भवति, वात एतदाप्याययति। निरु० ६।२८। (दीर्घम्) दीर्घकालं यावत् (सुतम्) वृष्टियागो निष्पादितः। अथ द्वितीयः—अध्यात्मवृष्टिपरः। दिव्यानन्दरसपूर्णस्य परमेश्वरस्य सकाशादानन्दवृष्टिं कामयमानः कश्चिदाह। हे (वसो) निर्धनस्य मम धनभूत, निवासप्रद जगदीश्वर ! आनन्दरसवर्षणार्थम् (स्तोत्रम्) स्तुतिम् (हर्यते) त्वां प्रति गमयते मह्यम् (कदा) कस्मिन् काले (श्मशा) त्वत्सकाशात् प्रवहन्ती आनन्दवारिधारा (वाः) आनन्दरसम् (आ अवरुधत्) आनीय मदीये हृदयरूपे क्षेत्रे जलाशये वा अवरोत्स्यति ? हे रसागार ! चिरदुःखदावाग्निदग्धेन मया (वाताप्याय) दिव्यानन्दवारिवर्षणाय (दीर्घम्) सुदीर्घकालं यावत् (सुतम्) श्रद्धारसप्रस्रवणपूर्वकम् अध्यात्मयागो निष्पादितः। तथापि किमिति आनन्दवारिवर्षा मां न प्राप्नुवन्ति ॥६॥ अत्र श्लेषालङ्कारः ॥६॥

भावार्थभाषाः -

यथाऽनावृष्टौ जातायां वर्षणार्थं दीर्घो वृष्टियज्ञोऽनुष्ठीयते तथैवानन्दरसपिपासुरहमानन्दरसवृष्टिमाप्तुं दीर्घं ध्यानयज्ञं चिरादनुतिष्ठन्नस्मि। हे प्रभो ! तथापि किमिति त्वमानन्दवारि न वर्षयसि ? वर्षय, वर्षय, देव ! दिव्यानन्दं वर्षय। अन्यथा बहुविधसांसारिकसंतापसंतप्तोऽहं नोत्सहिष्ये जीवनमपि धारयितुम् ॥६॥

टिप्पणी: १. ऋ० १०।१०५।१ ‘आ अव’ इत्यत्र ‘आव’ इति पाठः। २. श्मशा-शब्देनापि कुल्योच्यते। लुप्तोपमं चेदं द्रष्टव्यम्। श्मशेव कुल्येवोदकम्। एतदुक्तं भवति यथा कुल्या उदकमवरुणद्धि तद्वत् कदा स्तोत्रम् अवरोत्स्यसि, श्रोष्यसीत्यर्थः—इति वि०। श्मशा वायुः। शु आशु अश्नुते इति श्मशा वायुः इति यास्कः। आ अभिमुखम् अवारुधत् अवरुन्धीत वाः उदकम् तव स्तोत्रं हर्यते कामयमानाय यजमानाय—इति भ०। कदा कस्मिन् काले अवारुधत् अवरोत्स्यसि, अवरुध्य च कदा वाः वारयिष्यति। अश्नुते क्षेत्रम् इति श्मशा कुल्या, लुप्तोपमम् एतत्। यथा कुल्येतस्तत उदकान्यवरुणद्धि अवरुध्य च वारयति तथेत्यर्थः—इति सा०। ३. वातं प्राणम् आप्यायति इति वाताप्यम् उदकम्। आपोमयः प्राण इति श्रुतेः—इति भ०। वातेन आप्यते अधस्तान्निपात्यते इति वाताप्यम् उदकम्—इति सा०।