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पा꣢न्त꣣मा꣢ वो꣣ अ꣡न्ध꣢स꣣ इ꣡न्द्र꣢म꣣भि꣡ प्र गा꣢꣯यत । वि꣣श्वासा꣡ह꣢ꣳ श꣣त꣡क्र꣢तुं꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठं चर्षणी꣣ना꣢म् ॥१५५॥

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स्वर-रहित-मन्त्र

पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्र गायत । विश्वासाहꣳ शतक्रतुं मꣳहिष्ठं चर्षणीनाम् ॥१५५॥

पद पाठ

पा꣡न्त꣢꣯म् । आ । वः꣣ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣भि꣢ । प्र । गा꣣यत । विश्वासा꣡ह꣢म् । वि꣣श्व । सा꣡ह꣢꣯म् । श꣣त꣡क्र꣢तुम् । श꣣त꣢ । क्र꣣तुम् । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठम् । च꣣र्षणीना꣢म् ॥१५५॥

सामवेद » - पूर्वार्चिकः » मन्त्र संख्या - 155 | (कौथोम) 2 » 2 » 2 » 1 | (रानायाणीय) 2 » 5 » 1


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हिन्दी : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

प्रथमः—मन्त्र में इन्द्र के महिमागान के लिए मनुष्यों को प्रेरित किया गया है।

पदार्थान्वयभाषाः -

हे मनुष्यो ! (वः) तुम (अन्धसः) भोग्य वस्तुओं के (आ पान्तम्) सब ओर से रक्षक, (विश्वासाहम्) समस्त शत्रुओं के विजेता, (शतक्रतुम्) बहुत बुद्धिमान्, बहुत कर्मण्य, बहुत से यज्ञों को करनेवाले, (चर्षणीनाम्) मनुष्यों को (मंहिष्ठम्) अतिशय दान करनेवाले (इन्द्रम्) परमैश्वर्यशाली वीर परमात्मा और राजा को (अभि) लक्षित करके (प्र गायत) प्रकृष्ट रूप से गान करो अर्थात् उनके गुण-कर्म-स्वभावों का वर्णन करो ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेष और परिकर अलङ्कार है ॥१॥

भावार्थभाषाः -

सब मनुष्यों को योग्य है कि वे जगत् के रक्षक, समस्त काम-क्रोधादि रिपुओं के विजेता, असंख्य प्रज्ञाओं, असंख्य कर्मों और असंख्य यज्ञों से युक्त, सब मनुष्यों को विद्या, धन, धर्म आदि का अतिशय दान करनेवाले परमात्मा के और राष्ट्र के रक्षक, शत्रु-सेनाओं को हरानेवाले, विद्वान्, कर्मठ, अनेक यज्ञों के याज्ञिक, प्रजाओं को अतिशय विद्या, आरोग्य, धन आदि देनेवाले राजा के प्रति उनके गुण-कर्म-स्वभाव का वर्णन करनेवाले स्तुति-गीत और उद्बोधन-गीत गायें ॥१॥