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स हि त्वं दे॑व॒ शश्व॑ते॒ वसु॒ मर्ता॑य दा॒शुषे॑ । इन्दो॑ सह॒स्रिणं॑ र॒यिं श॒तात्मा॑नं विवाससि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa hi tvaṁ deva śaśvate vasu martāya dāśuṣe | indo sahasriṇaṁ rayiṁ śatātmānaṁ vivāsasi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । हि । त्वम् । दे॒व॒ । शश्व॑ते । वसु॑ । मर्ता॑य । दा॒शुषे॑ । इन्दो॒ इति॑ । स॒ह॒स्रिण॑म् । र॒यिम् । श॒तऽआ॑त्मानम् । वि॒वा॒स॒सि॒ ॥ ९.९८.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:98» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:23» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देव) हे दिव्यस्वरूप परमात्मन् ! (सः, त्वम्) पूर्वोक्त आप (मर्ताय, दाशुषे) जो आपकी उपासना में लगा हुआ पुरुष है, (शश्वते) निरन्तर कर्मयोगी है, उसके लिये (वसु) धन (सहस्रिणम्) जो अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य्योंवाला है, (शतात्मानम्) जिसमें अनन्त प्रकार के बल हैं, (रयिम्) ऐसे धन को (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (विवाससि) आप प्रदान करें ॥४॥
भावार्थभाषाः - सामर्थ्ययुक्त पुरुष को परमात्मा ऐश्वर्य्य प्रदान करता है, इसलिये ऐश्वर्य्यसम्पन्न होना परमावश्यक है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'सहस्त्री शतात्मा' रयि

पदार्थान्वयभाषाः - हे (देव) = प्रकाशमय सोम ! (सः त्वं हि) = वह तू ही (शश्वते) = [ शश् प्लुतगतौ] स्फूर्ति के साथ क्रियाओं में लगे हुये (दाशुषे) = प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाले मनुष्य के लिये (वसु) = जीवन धन को (विवाससि) = देता है। क्रिया में लगे रहना व प्रभुस्मरण ही सोमरक्षण का साधन है। सुरक्षित सोम इस रक्षक के लिये जीवन के लिये आवश्यक वसुओं को प्राप्त कराता है । हे (इन्दो) = सोम ! तू (रयिम्) = उस धन को भी [विवाससि ] प्राप्त कराता है जो (सहस्रिणम्) = सहस्रों की संख्या वाला है, अर्थात् जीवन यात्रा के लिये पर्याप्त है, तथा (शतात्मानम्) = शत वर्ष पर्यन्त हमें गति करानेवाला है (अत सातत्यगमने ) जो हमें अन्त तक क्रियाशील बनाये रखता है। वह धन जो कि हमें आलस्य का शिकार नहीं होने देता।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम प्रभुस्मरण पूर्वक क्रियाशील पुरुष को वसु सम्पन्न करता है। यह जीवनयात्रा के लिये पर्याप्त व निष्क्रिय न बना देनेवाले धन को प्राप्त कराता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देव) हे दिव्यस्वरूप ! (सः, त्वं) स भवान् (मर्ताय, दाशुषे) स्वसेवकजनाय (शश्वते) शश्वत्कर्मयोगिने (सहस्रिणं, वसु) विविधं धनं (शतात्मानं, रयिं) अनेकधा ऐश्वर्यं (इन्दो) हे परमात्मन् ! (विवाससि) ददातु भवान् ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, refulgent and generous spirit of peace, prosperity and beauty, you shine upon the charitable mortal of relentless discipline and bestow upon him wealth, honour and excellence of a hundredfold power and a thousandfold value.