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दि॒वो न सर्गा॑ अससृग्र॒मह्नां॒ राजा॒ न मि॒त्रं प्र मि॑नाति॒ धीर॑: । पि॒तुर्न पु॒त्रः क्रतु॑भिर्यता॒न आ प॑वस्व वि॒शे अ॒स्या अजी॑तिम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

divo na sargā asasṛgram ahnāṁ rājā na mitram pra mināti dhīraḥ | pitur na putraḥ kratubhir yatāna ā pavasva viśe asyā ajītim ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दि॒वः । न । सर्गाः॑ । अ॒स॒सृ॒ग्र॒म् । अह्ना॑म् । राजा॑ । न । मि॒त्रम् । प्र । मि॒ना॒ति॒ । धीरः॑ । पि॒तुः । न । पु॒त्रः । क्रतु॑ऽभिः । य॒ता॒नः । आ । प॒व॒स्व॒ । वि॒शे । अ॒स्यै । अजी॑तिम् ॥ ९.९७.३०

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:30 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:16» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:30


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! आप हमको (अजीतिम्) अजयभाव देकर (पवस्व) पवित्र करें। (दिवः) द्युलोक से (न) जिस प्रकार (अह्नाम्) आदित्य की (सर्गाः) रश्मियें (अससृग्रम्) प्रचार पाती हैं, इसी प्रकार परमात्मा की ज्योतियें प्रकाशरूप परमात्मा से प्रचार पाती हैं और (न) जिस प्रकार (धीरः) धीर (राजा) प्रजा का स्वामी (मित्रम्) मित्ररूप प्रजा को (न प्रमिनाति) नहीं मारता, इसी प्रकार परमात्मा सदाचारी लोगों को (न प्रमिनाति) नहीं मारता और (न) जिस प्रकार (यतानः) यत्नशील (पुत्रः) पुत्र (क्रतुभिः) यज्ञों के द्वारा (पितुः) पिता के ऐश्वर्य्य को चाहता है, इसी प्रकार हम लोग आपके ऐश्वर्य्य को सत्कर्मों द्वारा चाहते हैं, इसलिये (विशे) सन्तानरूप प्रजा को (आपवस्व) आप पवित्र करें ॥३०॥
भावार्थभाषाः - जो लोग परमात्मा से सन्तानों की शुद्धि की प्रार्थना करते हैं, परमात्मा उनकी सन्तानों को अवश्यमेव शुद्धि प्रदान करता है ॥३०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अजीतिम् आपवस्व

पदार्थान्वयभाषाः - (अह्नाम्) = दिनों में (दिवः) = आदित्य की (सर्गाः न) = रश्मियों की तरह जीवन में सोम की (सर्गाः) = धारायें- (प्र) = प्रवाह (अससृग्रम्) = उत्पन्न किये जाते हैं। ये सोम के प्रवाह ही ज्ञानरश्मियों की उत्पत्ति का कारण बनते हैं। (धीरः) = [धियं ईरयति] बुद्धि को प्रेरित करनेवाला (राजा) = जीवन को दीप्त करनेवाला सोम (मित्रम्) = अपने सखा को, अपने रक्षण करनेवाले को (न प्रमिनाति) = हिंसित नहीं करता । (क्रतुभिः) = शक्ति व प्रज्ञानों के साथ (यतानः) = यत्न करता हुआ (पुत्रः) = पुत्र (न) = जैसे (पितुः) = पिता के अपरभाव का कारण होता है, इसी प्रकार हे सोम ! तू (अस्यै विशे) = इस प्रजा के लिये (अजीतिम्) = अपराभव को (आपवस्व) = प्राप्त करा । सुरक्षित सोम कभी भी हमें रोगों व काम-क्रोध रूप शत्रुओं से आक्रान्त नहीं होने देता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम से हम 'प्रकाशमय, रोगादि से अनाक्रान्त, अपराभूत' जीवनवाले बनते हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! भवान् मह्यं (अजीतिं) अजयभावं (पवस्व) पुनातु (दिवः, न) यथा स्वर्गात् (अह्नां, सर्गाः) आदित्यरश्मयः (अससृग्रं) प्रचारं लभन्ते, इत्थं परमात्मज्योतींष्यपि तेजोमयात्तस्मात् प्रचारं लभन्ते (न) यथा (धीरः, राजा) धीरस्वामी (मित्रं, न, प्र मिनाति) मित्रप्रजा न हिनस्ति एवं परमात्मापि सदाचारिणं न हिनस्ति (न) यथा च (यतानः, पुत्रः) यतमानः सुतः (क्रतुभिः पितुः) यज्ञैः पितुरैश्वर्यं वाञ्छति एवं वयमपि सत्कर्मभिर्भवदैश्वर्यं कामयामहे, अतः (विशे, आ, पवस्व) सन्तानरूपप्रजां रक्षतु ॥३०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - As the rays of day light radiate from the sun, as a good ruler does not hurt the people and treats them as friends, as the son tries by yajnic actions to win the father’s love and favour, so O Soma, come to bless this people and assure their victory and progress.