वांछित मन्त्र चुनें

श॒तं धारा॑ दे॒वजा॑ता असृग्रन्त्स॒हस्र॑मेनाः क॒वयो॑ मृजन्ति । इन्दो॑ स॒नित्रं॑ दि॒व आ प॑वस्व पुरए॒तासि॑ मह॒तो धन॑स्य ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śataṁ dhārā devajātā asṛgran sahasram enāḥ kavayo mṛjanti | indo sanitraṁ diva ā pavasva puraetāsi mahato dhanasya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

श॒तम् । धाराः॑ । दे॒वऽजा॑ताः । अ॒सृ॒ग्र॒न् । स॒हस्र॑म् । ए॒नाः॒ । क॒वयः॑ । मृ॒ज॒न्ति॒ । इन्दो॒ इति॑ । स॒नित्र॑म् । दि॒वः । आ । प॒व॒स्व॒ । पु॒रः॒ऽए॒ता । अ॒सि॒ । म॒ह॒तः । धन॑स्य ॥ ९.९७.२९

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:29 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:16» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:29


397 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप (सनित्रम्) उपासना के साधनरूप ऐश्वर्य्य को (दिवः) द्युलोक से देकर (आपवस्व) हमको पवित्र करें, क्योंकि (पुरः) प्राचीनकाल से ही आप (महतो धनस्य) बड़े धनों के (एता) दाता (असि) हो। आप कैसे हैं, (शतं धाराः) अनन्त ब्रह्माण्डों के (असृग्रन्) धारण करनेवाले हैं और (सहस्रम्) सहस्रों प्रकार की (एनाः) विभूतियें (मृजन्ति) आपको अलंकृत करती हैं, (देवजाताः) दिव्यशक्तिसम्पन्न (कवयः) क्रान्तदर्शी विद्वान् तुमको शुद्ध स्वरूप से वर्णन करते हैं ॥२९॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के ऐश्वर्य्य को सब लोक-लोकान्तर वर्णन करते हैं। जो कुछ यह ब्रह्माण्ड है, वह परमात्मा की विभूति है अर्थात् यह सब चराचर जगत् परमात्मा के एकदेश में स्थिर है और परमात्मा इसको अपने में अभिव्याप्त करके सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है ॥२९॥
397 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

महान् धन का अग्रदूत

पदार्थान्वयभाषाः - हे सोम ! (देवजाताः) = दिव्यगुणों के विकास के लिये उत्पन्न हुई हुई (शतं धारा:) = सैकड़ों तेरी धारायें (असृग्रन्) = उत्पन्न की जाती हैं। (कवयः) = क्रान्तदर्शी ज्ञानी पुरुष (सहस्रः) = हजारों प्रकार से (एनाः) = इन धाराओं को (मृजन्ति) = शुद्ध करते हैं। इनके शोधन से ही वस्तुतः वे कवि बन पाते हैं । हे (इन्दो) = सोम ! तू (दिवः सनित्रम्) = ज्ञान के धन को (आपवस्व) = सर्वथा प्राप्त करा । तू ही इस (महतः धनस्य) = महान् धन का (पुरः एता असि) = अग्रगन्ता है। तेरे रक्षण व शरीर में व्यापन के पश्चात् ही यह ज्ञान का महान् धन प्राप्त होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञानी पुरुष सब प्रकार से सोम के शोधन के लिये, इसे वासनाओं के उबाल से मलिन न होने देने के लिये यत्नशील होते हैं । यह सुरक्षित सोम ही उन्हें ज्ञान के महान् धन को प्राप्त कराता है।
397 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूपपरमात्मन् ! भवान् (सनित्रं) उपासनासाधनैश्वर्यं (दिवः) द्युलोकाद्दत्त्वा (आ पवस्व) मां पुनातु, यतः (पुरः) प्राचीनकालादेव भवान् (महतः, धनस्य, एता, असि) महतो धनस्य दातास्ति (शतं धाराः) अनन्तब्रह्माण्डानां (असृग्रन्) उत्पाद्य धारकः (सहस्रं) सहस्रधा (एनाः) विभूतयः (मृजन्ति) अलं कुर्वन्ति भवन्तं (देवजाताः) दिव्यशक्तिसम्पन्नाः (कवयः) क्रान्तदर्शिनो विद्वांसः भवन्तं शुद्धस्वरूपेण वर्णयन्ति ॥२९॥
397 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Hundred streams of soma joy born of divinity flow for the divinities of nature and nobilities of humanity. A thousand ways poets and sages sing of them, adore and exalt them. O self-refulgent lord of bliss and generosity, let the holiest wealth and virtue flow from the light of divinity. You alone are the eternal, original and prime giver of the great wealth, honour and excellence of life.