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वृ॒ष्टिं नो॑ अर्ष दि॒व्यां जि॑ग॒त्नुमिळा॑वतीं शं॒गयीं॑ जी॒रदा॑नुम् । स्तुके॑व वी॒ता ध॑न्वा विचि॒न्वन्बन्धूँ॑रि॒माँ अव॑राँ इन्दो वा॒यून् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vṛṣṭiṁ no arṣa divyāṁ jigatnum iḻāvatīṁ śaṁgayīṁ jīradānum | stukeva vītā dhanvā vicinvan bandhūm̐r imām̐ avarām̐ indo vāyūn ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वृ॒ष्टिम् । नः॒ । अ॒र्ष॒ । दि॒व्याम् । जि॒ग॒त्नुम् । इळा॑ऽवतीम् । श॒म्ऽगयी॑म् । जी॒रऽदा॑नुम् । स्तुका॑ऽइव । वी॒ता । ध॒न्व॒ । वि॒ऽचि॒न्वन् । बन्धू॑न् । इ॒मान् । अव॑रान् । इ॒न्दो॒ इति॑ । वा॒यून् ॥ ९.९७.१७

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:17 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:14» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:17


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (नः) हमारे लिये आप (दिव्याम्) दिव्य (वृष्टिम्) वृष्टि (अर्ष) दें। जो वृष्टि (जिगत्नुं) सर्वत्र व्याप्त हो (इळावतीम्) अन्नवाली हो (शंगयीम्) सुखप्रद हो (जीरदानुम्) शीघ्र ऐश्वर्य्य को देनेवाली हो और तुम (वीता, स्तुका, इव) सुन्दर सन्तानों के समान (विचिन्वन्) उत्पन्न करते हुए (इमान्, बन्धून्) इस बन्धुगण को (अवरान्) जो देश-देशान्तरों में स्थिर है और (वायून्) वायु के समान गतिशील है, उसको (धन्व) आकर प्राप्त हो ॥१७॥
भावार्थभाषाः - यद्यपि परमात्मा स्व-स्व कर्मानुकूल ऊँच-नीच गति प्रदान करता है, तथापि वह सन्तानों के समान जीवमात्र की भलाई चाहता है, इसलिये कर्मों द्वारा सुधार करके सबको शुभ मार्ग में प्रेरित करता है ॥१७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दिव्यां वृष्टिं अर्ष

पदार्थान्वयभाषाः - सुरक्षित सोम अन्तत: धर्ममेघ समाधि में हमें पहुँचने के योग्य बनाकर दिव्य आनन्द की वर्षा को प्राप्त कराता है। इसी बात को कहते हैं कि हे सोम ! तू (नः) = हमारे लिये (दिव्यां वृष्टिम्) = इस दिव्य - अलौकिक वर्षा को (अर्षः) = प्राप्त करा। जो वृष्टि (जिगत्नुं) = हमें गतिशील बनाती है, यह ब्रह्मनिष्ठ व्यक्ति अधिक क्रियाशील हो जाता है 'क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ' । (इडावतीम्) = यह वेदवाणी वाली है, इस दिव्य वृष्टि का अनुभव करनेवाला ज्ञान की ओर झुकता है । (शंगयीम्) = यह शान्ति का घर है, हमारे जीवन को शान्त बनाती है। (जीरदानुम्) = शीघ्रता से सब वरणीय वस्तुओं का हमारे लिये दान करती है या हमें उत्कृष्ट जीवन प्राप्त कराती है। हे (इन्दो) = सोम ! (इमान्) = इन (अवरान् बन्धून्) = अवर देश में स्थित बन्धुभूत (वायून्) = प्राणों को (विचिन्वन्) = विशेषरूप से संचित करता हुआ (धन्व:) = शरीर में गतिवाला हो। उन प्राणों का संचय करता हुआ तू गतिवाला हो जो (स्तुकः इव) = कुञ्चित केशसमूह के समान (वीता) = सुन्दर है। प्राण उनचास भागों में बँटे हुए हैं, सब के सब बड़े सुन्दर हैं। ये तभी तक सुन्दर है जब तक कि मिलकर इनका कार्य होता रहे। अकेले प्राण का सौन्दर्य उसी प्रकार नहीं रहता जैसे कि एक बाल का। इन प्राणों की शक्ति भी सोमरक्षण से वृद्धि को प्राप्त होती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम धर्ममेघ समाधि में प्राप्त होनेवाली दिव्य वृष्टि को प्राप्त कराता है, प्राणों का विशेष रूप से संचय करता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे परमात्मन् ! (नः) अस्मभ्यं (दिव्यां, वृष्टिं) दिव्यवर्षं (अर्ष) प्रयच्छतु या वृष्टिः (जिगत्नुं) सर्वत्र व्याप्ता (इळावतीं) अन्नप्रदा (शंगयीं) सुखप्रदा (जीरदानुं) ऐश्वर्यप्रदा च स्यात्। भवांश्च (वीता, स्तुका इव) कान्तसन्ततीरिव (विचिन्वन्) उत्पादयन् (इमान्, बन्धून्) इमान्बन्धुगणान् (अवरान्) देशदेशान्तरस्थान् (वायून्) वायुमिव गतिशीलान् (धन्व) आगत्य प्राप्नोतु ॥१७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, refulgent giver, bring us celestial rains, dynamic and universal, productive and illuminative, peace giving and abundantly generous. Selecting and favouring like loved children these friendly and brotherly people here and elsewhere, vibrant as winds, pray inspire and energise them to live a full joyous life.