वांछित मन्त्र चुनें

अ॒स्य प्रे॒षा हे॒मना॑ पू॒यमा॑नो दे॒वो दे॒वेभि॒: सम॑पृक्त॒ रस॑म् । सु॒तः प॒वित्रं॒ पर्ये॑ति॒ रेभ॑न्मि॒तेव॒ सद्म॑ पशु॒मान्ति॒ होता॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asya preṣā hemanā pūyamāno devo devebhiḥ sam apṛkta rasam | sutaḥ pavitram pary eti rebhan miteva sadma paśumānti hotā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्य । प्रे॒षा । हे॒मना॑ । पू॒यमा॑नः । दे॒वः । दे॒वेभिः॑ । सम् । अ॒पृ॒क्त॒ । रस॑म् । सु॒तः । प॒वित्र॑म् । परि॑ । ए॒ति॒ । रेभ॑न् । मि॒ताऽइव । सद्म॑ । प॒शु॒ऽमन्ति॑ । होता॑ ॥ ९.९७.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:11» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:1


458 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

अब विद्वानों के गुण वर्णन किये जाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (सुतः) विद्या द्वारा संस्कृत हुआ विद्वान् (रेभन्) शब्दायमान होता हुआ (पवित्रं, पर्य्येति) पवित्रता को प्राप्त होता है। जिस प्रकार (पशुमन्ति) ज्ञानवाले स्थान को (मिता, इव) नियमी पुरुष के समान (होता) यज्ञकर्ता पुरुष प्राप्त होता है। (अस्य, प्रेषा) उक्त विद्वान् की जिज्ञासा करनेवाला पुरुष (हेमना, पूयमानः) सुवर्णादि भूषणों से पवित्र होता हुआ (देवेभिः, सम्पृक्तः) विद्वानों से संगति को लाभ करता हुआ (देवः) दिव्य भाववाला (रसम्) ब्रह्मानन्द को प्राप्त होता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् पुरुषों के शिष्य अर्थात् जो पुरुष वेदवेत्ता विद्वानों से शिक्षा पाकर विभूषित होते हैं, वे सदैव ऐश्वर्य्य से विभूषित रहते हैं ॥१॥
458 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रेषा, हेमना

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) = इस प्रभु की (प्रेषा) = प्रेरणा से तथा (हेमना) = ज्ञानज्योति से (पूयमानः) = पवित्र किया जाता हुआ (देवः) = यह दिव्यगुणों को जन्म देनेवाला सोम [वीर्य] (देवेभिः) = देववृत्ति वाले पुरुषों के साथ (रसं समपृक्त) = उस आनन्दमय प्रभु को संपृक्त करता है 'रसौ वै सः' सोमरक्षण के द्वारा देववृत्ति के पुरुष प्रभु को प्राप्त करते हैं, सोम का रक्षण चित्तवृत्ति की एकाग्रता से प्रभु प्रेरणा को सुनने व स्वाध्याय से ज्ञानवृद्धि के द्वारा होता है । (सुतः) = उत्पन्न हुआ हुआ यह सोम (रेभन्) = प्रभु का साधन करता हुआ, अपने रक्षक को प्रभु का स्तोता बनाता हुआ (पवित्रम्) = पवित्र हृदयवाले पुरुष को (पर्येति) = शरीर में चारों ओर प्राप्त होता है । इस प्रकार प्राप्त होता है, (इव) = जैसे कि (होता) = यज्ञशील पुरुष (मिता) = बड़े माप से बनाये हुए (पशुमान्ति) = प्रशस्त पशुओं वाले सद्म यज्ञगृहों को प्राप्त होता है। इन यज्ञगृहों में 'अग्रिहोत्री' गौ बंधी होती है, इसके ही दूध से घृत आदि प्राप्त करके यज्ञों की सिद्धि होती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये आवश्यक है कि हम ध्यान व स्वाध्याय की वृत्ति को अपनायें । इससे हम देव बनेंगे, प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होंगे।
458 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

अथ विदुषां गुणा वर्ण्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (सुतः) विद्यया संस्कृतो विद्वान् (रेभन्) शब्दं कुर्वन् (पवित्रं, परि एति) पवित्रतां लभते यथा (पशुमन्ति) यज्ञगृहं (मिता, इव, सद्म) ज्ञानस्थानं नियमीपुरुष इव (होता) यज्ञकर्ता प्राप्नोति (अस्य, प्रेषा) उक्तविदुषो जिज्ञासुः पुरुषः (हेमना, पूयमानः) सुवर्णादिभूषणेन पवित्रः सन् (देवेभिः, सम्पृक्तः) विद्वद्भिः संगतः (देवः) दिव्यभाववान् सन् (रसं) ब्रह्मानन्दं प्राप्नोति ॥१॥
458 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Divine Soma, moved and energised by the surge of golden impulse, joins its potency with the senses and mind, and thus seasoned and empowered, vibrant with vitality, it moves to the holiness of the heart like a sanative, or as a priest going to a yajnic enclosure, seat and anchor of sensitive visionary powers of humanity.