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अ॒यं त॑ आघृणे सु॒तो घृ॒तं न प॑वते॒ शुचि॑ । आ भ॑क्षत्क॒न्या॑सु नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayaṁ ta āghṛṇe suto ghṛtaṁ na pavate śuci | ā bhakṣat kanyāsu naḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒यम् । ते॒ । आ॒घृ॒णे॒ । सु॒तः । घृ॒तम् । न । प॒व॒ते॒ । शुचि॑ । आ । भ॒क्ष॒त् । क॒न्या॑सु । नः॒ ॥ ९.६७.१२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:67» मन्त्र:12 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:15» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:12


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आघृणे) हे सर्वप्रकाशक परमात्मन् ! (अयं) यह (सुतः) संस्कृत (ते) आपका (शुचि) शुद्ध स्वभाव (घृतं न) स्नेह की तरह (पवते) पवित्र करता है और (नः) हम लोगों को (कन्यासु) अपने कल्याणकारक गुणों में (आभक्षत्) ग्रहण करता है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - जो लोग परमात्मसुखोपलब्धि के लिए सत्कर्म करते हैं, उन्हें परमात्मा मङ्गलमय बनाता है ॥१२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दीप्ति व पवित्रता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (आघृणे) = ज्ञानदीप्ति से सर्वतः दीप्तिमन् पुरुष ! (अयम्) = यह सोम (ते सुतः) = तेरे लिये उत्पन्न किया गया है। उत्पन्न हुआ हुआ यह सोम (घृतं न) = घृत के समान, ज्ञानदीप्ति के समान (शुचि) = पवित्रता को करता हुआ (पवते) = तेरे में गतिवाला होता है। तुझे ज्ञानदीप्त करता है और पवित्र बनाता है । [२] यह सोम (नः) = हमें (कन्यासु) = सब दीप्तियों में (आभक्षत्) = भागी बनाये ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- स्वाध्याय में लगे रहने से सुरक्षित हुआ हुआ यह सोम हमें दीप्ति व पवित्रता को प्राप्त कराता है दीप्ति व पवित्रता को प्राप्त करके यह 'विश्वामित्र' सबके प्रति स्नेहवाला बनता है और इस प्रकार सोम का स्तवन करता है-
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आघृणे) सर्वप्रकाशक परमात्मन् ! (अयम्) असौ (सुतः) संस्कृतः (ते) भवतः (शुचि) शुद्धः स्वभावः (घृतं न) स्नेह इव (पवते) पवित्रयति। अथ च (नः) अस्मान् (कन्यासु) कल्याणकारिगुणेषु (आभक्षत्) गृह्णाति ॥१२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord of light and fire of passion and peace, this soma ecstasy of your love, passion and peace of life, pure, purifying and inspiring, flows abundant like ghrta into the vedi. May this passion, light and peace inspire us and join us in our cherished pursuits of life with complete commitment and dedication.