वांछित मन्त्र चुनें

प्र ते॑ दि॒वो न वृ॒ष्टयो॒ धारा॑ यन्त्यस॒श्चत॑: । अ॒भि शु॒क्रामु॑प॒स्तिर॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra te divo na vṛṣṭayo dhārā yanty asaścataḥ | abhi śukrām upastiram ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । ते॒ । दि॒वः । न । वृ॒ष्टयः॑ । धाराः॑ । य॒न्ति॒ । अ॒स॒श्चतः॑ । अ॒भि । शु॒क्राम् । उ॒प॒ऽस्तिर॑म् ॥ ९.६२.२८

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:62» मन्त्र:28 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:29» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:28


374 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे सेनापते ! (दिवः वृष्टयः न) जिस प्रकार आकाश से जल की अनेक धाराओं का पात होता है, उसी प्रकार (ते) आपकी (धाराः) रक्षक सेनायें (असश्चतः) पृथक्-पृथक् (प्रयन्ति) इधर-उधर विचरती हैं और (शुक्राम् अभि) अपनी रक्षणीय पवित्र प्रजा को (उपस्तिरम्) भली-भाँति अनुगृहीत करती हैं ॥२८॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार सेनापति की सेनायें इतस्ततः विचरती हुई उसके महत्त्व को बतलाती हैं, उसी प्रकार अनन्त ब्रह्माण्ड परमात्मा के महत्त्व को सेनाओं की नाईं सुशोभित करते हैं ॥२८॥
374 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अभि शुक्रां उपस्तिरम्'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! (दिवः वृष्टयः) = नद्युलोक से होनेवाली वृष्टियों की तरह (ते) = तेरी (असश्चतः) = [unceasing, not drying up] न शुष्क हो जानेवाली (धाराः) = धारायें (प्रयन्ति) = हमें प्रकर्षेण प्राप्त होती हैं । जैसे द्युलोक से होनेवाली वृष्टि सब सन्ताप का हरण करनेवाली होती है, इसी प्रकार इस सोम की धारायें शरीर के सब सन्तापों को विनष्ट करती हैं । [२] ये धारायें (शुक्राम्) = अत्यन्त निर्मल (उपस्तिरम्) = आच्छादन का (अभि) = लक्ष्य करके हमें प्राप्त होती हैं । यह 'अत्यन्त निर्मल आच्छादन' प्रभु ही है। 'अमृतोपस्तरणमसि' । यह सोम हमें प्रभु को प्राप्त करानेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - निरन्तर शरीर में प्रवाहित होनेवाली सोम की धारायें सब सन्तापों का हरण करती हुई प्रभुरूप दीत आच्छादन को हमें प्राप्त कराती हैं।
374 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे चमूपते ! (दिवः वृष्टयः न) यथा नभस्तोऽनेकजलधारापातस्तथा (ते) भवतः (धाराः) रक्षाकर्त्र्यः सेनाः (असश्चतः) पृथक् पृथक् (प्रयन्ति) इतस्ततो विचरन्ति तथा (शुक्राम् अभि) स्वपवनीयप्रजाः (उपस्तिरम्) बाढमनुगृह्णन्ति ॥२८॥
374 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like showers of light from heaven, the streams of your grace shower upon the bright world of humanity below on the wide earth, incessantly.