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उ॒स्रा वे॑द॒ वसू॑नां॒ मर्त॑स्य दे॒व्यव॑सः । तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

usrā veda vasūnām martasya devy avasaḥ | tarat sa mandī dhāvati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒स्रा । वे॒द॒ । वसू॑नाम् । मर्त॑स्य । दे॒वी । अव॑सः । तर॑त् । सः । म॒न्दी । धा॒व॒ति॒ ॥ ९.५८.२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:58» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:15» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वसूनाम् उस्रा) सर्वविध रत्नादि ऐश्वर्यों की प्रदात्री (देवी) उस परमात्मा की दिव्यशक्ति (मर्तस्य अवसः वेद) जीवों की रक्षा करने में जागरूक रहती है (तरत् स मन्दी धावति) और वह परमात्मा सबको तारता हुआ आनन्दरूप से सर्वत्र व्याप्त है ॥२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के आनन्द से ही आनन्दित होकर सब प्राणी सुख को उपलब्ध करते हैं अर्थात् आनन्दमय एकमात्र परमात्मा ही है, कोई अन्य नहीं ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञानरश्मि-वसु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र में वर्णित (अवस:) = रक्षण करनेवाले सोम की धारा (उस्त्रा) = [A ray of light] प्रकाश की किरण ही है। यह अपने रक्षक की ज्ञानदीप्ति को बढ़ानेवाली है। (वसूनां वेद) = [विद लाभे] यह वसुओं को प्राप्त करानेवाली है। इसके रक्षण से शरीर में निवास को उत्तम बनानेवाले सब तत्त्वों का रक्षण होता है। यह सोम की धारा (मर्तस्य देवी) = समान्य मनुष्य को दिव्य गुण- सम्पन्न बनानेवाली है 'ऋषिकृन् मर्त्यानाम्' मनुष्यों को मानो ऋषि बना देती है। [२] (तरत्) = वासनाओं व रोगों को तैरता हुआ (सः) = वह (मन्दी) = ज्ञान से दीप्त होता हुआ (धावति) = अपने जीवन को बड़ा शुद्ध बना लेता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम ज्ञानरश्मियों को प्राप्त कराता है, वसुओं को प्राप्त कराता है और हमें देव बना देता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वसूनाम् उस्रा) अनेकविधरत्नाद्यैश्वर्यदात्री (देवी) तस्य परमात्मनो दिव्यशक्तिः (मर्तस्य अवसः वेद) जीवरक्षायां जागरूका भवति। (तरत् स मन्दी धावति) तथा च स परमात्मा सर्वांस्तारयन् आनन्दरूपेण सर्वत्र व्याप्तोऽस्ति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Mother source of wealth, honour and enlightenment, divine power that commands the saving art for the mortals, saviour, delightful, giver of fulfilment flows on.