च॒रुर्न यस्तमी॑ङ्ख॒येन्दो॒ न दान॑मीङ्खय । व॒धैर्व॑धस्नवीङ्खय ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
carur na yas tam īṅkhayendo na dānam īṅkhaya | vadhair vadhasnav īṅkhaya ||
पद पाठ
च॒रुः । न । यः । तम् । ई॒ङ्ख॒य॒ । इ॒न्दो॒ इति॑ । न । दान॑म् । ई॒ङ्ख॒य॒ । व॒धैः । व॒ध॒स्नो॒ इति॑ वधऽस्नो । ई॒ङ्ख॒य॒ ॥ ९.५२.३
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:52» मन्त्र:3
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:9» मन्त्र:3
| मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:3
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे परमात्मन् ! (यः चरुः) जो आप चराचर को ग्रहण करनेवाले हैं, (तम् न ईङ्खय) वह आप अपने रूप को शीघ्र प्राप्त कराइये और (दानम् न ईङ्खय) मुझको दातव्य वस्तु को शीघ्र प्राप्त कराइये। (वधैः वधस्नो ईङ्खय) हे अपनी प्रबल शक्तियों से शत्रुओं के नाश करनेवाले आप मुझ को सत्कर्म की ओर प्रेरित कीजिये ॥३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा ने सत्कर्म्मी बनाने का उपदेश दिया है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
चरु तथा दान
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! (यः चरु: न) = जो चरु [An oblation of rice and barley] के समान उत्कृष्ट भोजन है (तं ईंखय) = उसे हमारे लिये प्राप्त करा । अर्थात् हम यज्ञ करके सदा यज्ञशेष रूप अमृत का ही सेवन करनेवाले बनें । यह चरु के रूप में किया गया भोजन सोमरक्षण की अनुकूलता को पैदा करता है। [२] (इन्दो) = हे हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम (न) = [ इदानीं सा] अब (दानम्) = दान की वृत्ति को (ईंखय) = हमें प्राप्त करा । सोमरक्षक पुरुष दान की वृत्तिवाला होता है । भोगवृत्ति सोमरक्षण के प्रतिकूल है। [३] (वधस्त्रो) = रोगकृमियों के वध के लिये शरीर में स्तुति होनेवाले सोम (वधैः) = सब अवाञ्छनीय तत्त्वों के विनाश के हेतु से (ईंखय) = तू हमारे अंग-प्रत्यंग में गतिवाला हो। तेरे द्वारा हमारा सारा शरीर निर्मल हो उठे ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये आवश्यक है कि हम यज्ञशेष का सेवन करें। दान की वृत्तिवाले हों न कि भोगवृत्तिवाले तथा अंग-प्रत्यंग में सोम को प्राप्त कराके हम सब आधिव्याधियों को विनष्ट करनेवाले हों ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे परमेश्वर ! (यः चरुः) यस्त्वं चराचरग्रहणकर्तासि (तम् न ईङ्खय) स त्वमाशु स्वरूपतां नय। अथ च (दानम् न ईङ्खय) मह्यं दातव्यमपि वस्तु झटिति प्रापय। (वधैः वधस्नो ईङ्खय) हे प्रबलशक्त्या रातिनाशकर्त्तः परमात्मन् ! मां शुभकर्मणि नियोजय ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Indu, spirit of peace, plenty and generosity, inspire him who is receptive and generous as a cloud, move him like charity in flow. O shaping power of hard discipline, shape him through hardness and inspire him to the good life of generosity and joy.
