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ए॒ष विप्रै॑र॒भिष्टु॑तो॒ऽपो दे॒वो वि गा॑हते । दध॒द्रत्ना॑नि दा॒शुषे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

eṣa viprair abhiṣṭuto po devo vi gāhate | dadhad ratnāni dāśuṣe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒षः । विप्रैः॑ । अ॒भिऽस्तु॑तः । अ॒पः । दे॒वः । वि । गा॒ह॒ते॒ । दध॑त् । रत्ना॑नि । दा॒शुषे॑ ॥ ९.३.६

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:3» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:21» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:6


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एषः) यह परमात्मा (विप्रैः) मेधावी लोगों के द्वारा (अभिष्टुतः) वर्णन किया गया है “विप्र इति मेधाविनामसु पठितम्” निरु० ३।१९५ (अपो देवः) कर्मों का अध्यक्ष है (विगाहते) सम्पूर्ण संसार की उत्पति स्थिति प्रलय करनेवाला है, (दाशुषे) यह यजमानों को (रत्नानि) नाना प्रकार के धन (दधत्) देवे ॥६॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग जिस परमात्मा का नाना प्रकार से वर्णन करते हैं, वही इन्द्रियागोचर और एकमात्र ज्ञानगम्य परमात्मा सर्वाधार, सर्वकर्ता, अजर, अमर और कूटस्थनित्य है, इसी की उपासना सबको करनी चाहिये ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रत्नों का आधान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एषः) = यह (विप्रैः) = मेधावी पुरुषों से (अभिष्टुतः) = अभ्युदय व निःश्रेयस प्राप्ति के साधन के रूप में स्तुत हुआ हुआ (देवः) = रोगों को जीतने की कामनावाला सोम (अपः विगाहते) = कर्मों का अवगाहन करता है। सोम के रक्षण से इहलोक अभ्युदयवाला बनता है तो परलोक निःश्रेयसवाला होता है। एवं सोम इहलोक व परलोक दोनों के दृष्टिकोण से स्तुत होता है। रक्षित सोम से शक्ति वर्धन होकर हमारा जीवन कर्ममय होता है। इस प्रकार यह सोम हमें कर्मों में अवगाहन करनेवाला बनाता है । [२] यह सोम (दाशुषे) = अपने को सोम के प्रति दे डालनेवाले के लिये, सोमरक्षण को ही जीवन का लक्ष्य बना लेनेवाले के लिये (रत्नानि दधत्) = रत्नों को धारण करता है । सोम के रक्षित होने पर हमें सभी रमणीय वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। यही भाव चतुर्थ मन्त्र में 'विश्वानि वार्या सिषासति' इन शब्दों से कहा गया है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे जीवन का ध्येय सोम का रक्षण हो । यह रक्षित सोम सब रमणीय वस्तुओं को हमें प्राप्त करायेगा। इसके रक्षण से तमोगुण की अकर्मण्यता नष्ट हो जाएगी।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एषः) अयं परमात्मा (विप्रैः) मेधाविभिः (अभिष्टुतः) वर्णितः (अपो देवः) कर्मणामध्यक्षः (विगाहते) समस्तस्य जगतः सृष्टिस्थितिलयकर्ता (दाशुषे) यजमानाय (रत्नानि) विविधं धनम् (दधत्) दद्यात् ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This spirit, divine, generous and refulgent, adored and exalted by sages and scholars, and holding jewel gifts of life for people of generous charity, watches and controls the actions of humanity and the laws of nature in operation.