ए॒ष दे॒वो र॑थर्यति॒ पव॑मानो दशस्यति । आ॒विष्कृ॑णोति वग्व॒नुम् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
eṣa devo ratharyati pavamāno daśasyati | āviṣ kṛṇoti vagvanum ||
पद पाठ
ए॒षः । दे॒वः । र॒थ॒र्य॒ति॒ । पव॑मानः । द॒श॒स्य॒ति॒ । आ॒विः । कृ॒णो॒ति॒ । व॒ग्व॒नुम् ॥ ९.३.५
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:3» मन्त्र:5
| अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:20» मन्त्र:5
| मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:5
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (एष देवः) यह पूर्वोक्तदेव (पवमानः) सबको पवित्र करता हुआ (रथर्यति) सदा सबका शुभ चाहता है और (दशस्यति) मनोवाञ्छित फलों की प्राप्ति कराता है तथा (वग्वनुम्) सत्य को (आविष्कृणोति) प्रकट करता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - वही परमात्मा सबके लिये पवित्रता का धाम है। सब लोग आत्मिक, शारीरिक तथा सामाजिक पवित्रताएँ उसी से प्राप्त करते हैं, इसलिये वही परमदेव एकमात्र उपासनीय है ॥७॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
रथर्यति - दशस्यति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एषः) = यह सोम (देवः) = सब रोगों को जीतने की कामना करता हुआ (रथर्यति) = उत्तम रथ को चाहता है, शरीर रूप रथ को उत्तम बनाना चाहता है। (पवमानः) = हमारे जीवनों को पवित्र बनाता हुआ (दशस्यति) = [दश आत्मनः इच्छति ] दसों इन्द्रियाश्वों को सुन्दर बनाता है । सोम के द्वारा शरीर - रथ भी ठीक बना रहता है और इन्द्रियाश्व भी शक्तिशाली बने रहते हैं । [२] यह सोम हमारी ज्ञानाग्नि का ईंधन बनकर (वग्वनुम्) = उत्तम ज्ञान की वाणियों को (आविष्कृणोति) = प्रकट करता है । बुद्धि के दीप्त होने पर और हृदय के पवित्र होने पर अन्तः स्थित प्रभु की प्रेरणायें सुन ही पड़ती हैं। यही आत्मा की आवाज का सुनाई पड़ना है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से शरीर, इन्द्रियाँ व बुद्धि सभी का ठीक विकास होता है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (एष, देवः) अयं देवः परमात्मा (पवमानः) सर्वं पुनानः (रथर्यति) सर्वस्य शुभं काङ्क्षति (दशस्यति) मनोवाञ्छितं प्रापयति च तथा (वग्वनुम्) सत्यम् (आविष्कृणोति) प्रकटयति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - This spirit of divinity going forward like a chariot, pure, purifying, gives the gifts of life and reveals new and latest words of advance knowledge as it moves on.
