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अ॒भि विप्रा॑ अनूषत मू॒र्धन्य॒ज्ञस्य॑ का॒रव॑: । दधा॑ना॒श्चक्ष॑सि प्रि॒यम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi viprā anūṣata mūrdhan yajñasya kāravaḥ | dadhānāś cakṣasi priyam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि । विप्राः॑ । अ॒नू॒ष॒त॒ । मू॒र्धन् । य॒ज्ञस्य॑ । का॒रवः॑ । दधा॑नाः । चक्ष॑ति । प्रि॒यम् ॥ ९.१७.६

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:17» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:8» वर्ग:7» मन्त्र:6 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:6


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (कारवः) कर्मकाण्डी और (चक्षसि प्रियम् दधानाः) उस सर्वद्रष्टा परमेश्वर में प्रेम को धारण करते हुए (विप्राः) विद्वान् लोग (यज्ञस्य मूर्धनि) यज्ञ के प्रारम्भ में (अभ्यनूषत) उस परमात्मा की भली-भाँति स्तुति करते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - यज्ञ के प्रारम्भ में उद्गाता आदि लोग पहले परमात्मा के महत्त्व का गायन करके फिर यज्ञ के अन्य कर्मों का आरम्भ करते हैं ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विप्राः - कारवः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विप्रः) = अपना विशेष रूप से पूरण करनेवाले, (कारवः) = यज्ञादि उत्तम कर्मों को करनेवाले पुरुष (यज्ञस्य) = श्रेष्ठतम कर्म के (मूर्धन्) = शिखर में (अभि अनूषत) = प्रातः सायं स्तवन करते हैं। यज्ञों को करना व प्रभु-स्तवन करना ही सोमरक्षण का साधन है । [२] (चक्षसि) = ज्ञान के होने पर (प्रियं दधानाः) = इस प्रीणित करनेवाले सोम को ये धारित करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के तीन साधन हैं- [क] यज्ञों में लगना, [ख] प्रभु-स्तवन, [ग] स्वाध्याय द्वारा ज्ञानवर्धन ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (कारवः) कर्मकाण्डिनः (चक्षसि प्रियम् दधानाः) तत्र सर्वद्रष्टरि प्रेम दधानाः (विप्राः) विद्वांसश्च (यज्ञस्य मूर्धनि) यज्ञारम्भे (अभ्यनूषत) तं परमात्मानं साधु स्तुवन्ति ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Poets, vibrant scholars and sages and earnest supplicants adore and glorify Soma in the beginning of yajna, reposing perfect faith and love in the all-watching divine lord of peace, power and glory.