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पु॒ना॒नः सो॑म॒ जागृ॑वि॒रव्यो॒ वारे॒ परि॑ प्रि॒यः । त्वं विप्रो॑ अभ॒वोऽङ्गि॑रस्तमो॒ मध्वा॑ य॒ज्ञं मि॑मिक्ष नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

punānaḥ soma jāgṛvir avyo vāre pari priyaḥ | tvaṁ vipro abhavo ṅgirastamo madhvā yajñam mimikṣa naḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पु॒ना॒नः । सो॒म॒ । जागृ॑विः । अव्यः॑ । वारे॑ । परि॑ । प्रि॒यः । त्वम् । विप्रः॑ । अ॒भ॒वः॒ । अङ्गि॑रःऽतमः । मध्वा॑ । य॒ज्ञम् । मि॒मि॒क्ष॒ । नः॒ ॥ ९.१०७.६

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:107» मन्त्र:6 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:13» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:6


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! (पुनानः) आप सबको पवित्र करते हुए (जागृविः) सदैव अपनी चेतन सत्ता से विराजमान हैं, (अव्यः) सर्वरक्षक हैं, (वारे) आपको वरण करनेवाले पुरुष के अन्तःकरण में (परि, प्रियः) आप अत्यन्त प्रिय हैं, (त्वम्) आप (विप्रः) मेधावी हैं, “विप्र इति मेधाविनामसु पठितम्” (अङ्गिरस्तमः, अभवः) सब प्राणों में प्रियतम अर्थात् प्राणों के भी प्राण हैं, (मध्वा) अपने आनन्द से (नः) हमारे (यज्ञम्) यज्ञ को (मिमिक्ष) सिञ्चन करें ॥६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपासकों के यज्ञों को अपनी ज्ञानमयी वृष्टि द्वारा सुसिञ्चित करके आनन्दित करते हैं ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विप्रः अंगिरस्तमः

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सोम) = वीर्य ! (पुनानः) = पवित्र किया जाता हुआ तू (जागृविः) = सदा जागरित प्रहरी है। तू हमारे पर रोगादि शत्रुओं के आक्रमण को नहीं होने देता। (अव्यः) = रक्षक पुरुष के (वारे) = जिसमें से वासनाओं का वारण किया गया है उस हृदय में (परिप्रियः अभवः) = सर्वथा प्रिय होता है, प्रीणन को करनेवाला होता है । (त्वम्) = तू (विप्रः) = विशेष रूप से पूरण करनेवाला, (अंगिरस्तमः) = अतिशयेन अंग-प्रत्यंग में रस का संचार करनेवाला (अभवः) = होता है। हे सोम ! तू (नः यज्ञम्) = हमारे इस जीवन-यज्ञ को (मध्वा) = माधुर्य से (मिमिक्ष) = सीचनेवाला हो । जीवन को मधुर बनानेवाला हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम हमारा सावधान प्रहरी है । हमारा पूरण करनेवाला, अंग-प्रत्यंग में रस का संचार करनेवाला व जीवन को मधुर बनानेवाला है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! (पुनानः) सर्वान् पावयन् भवान् (जागृविः) शश्वन्निजचेतनसत्तया विराजमानः (अव्यः) सर्वरक्षकः (वारे) त्वद्वरणकर्तुरन्तःकरणे (परि, प्रियः) नितान्तप्रियः (त्वं, विप्रः) भवान् मेधाव्यस्ति (अङ्गिरस्तमः, अभवः) सर्वप्राणेषु अतिप्रियतमः (मध्वा) स्वानन्देन (नः) अस्माकं (यज्ञं) क्रतुं (मिमिक्ष) सिञ्चतु ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pure and all purifying, O Soma, spirit of peace and bliss, ever awake and awakening with your eternal consciousness, all protective and promotive, dearest in the heart of the cherished loving soul, you are the vibrant awareness of omniscience and the very life energy of life. O Spirit of peace, joy and divine bliss, pray bless our yajna of life with the honey sweets of existence.