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इन्द्रा॑य पवते॒ मद॒: सोमो॑ म॒रुत्व॑ते सु॒तः । स॒हस्र॑धारो॒ अत्यव्य॑मर्षति॒ तमी॑ मृजन्त्या॒यव॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indrāya pavate madaḥ somo marutvate sutaḥ | sahasradhāro aty avyam arṣati tam ī mṛjanty āyavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रा॑य । प॒व॒ते॒ । मदः॑ । सोमः॑ । म॒रुत्व॑ते । सु॒तः । स॒हस्र॑ऽधारः । अति॑ । अव्य॑म् । अ॒र्ष॒ति॒ । तम् । ई॒म् इति॑ । मृ॒ज॒न्ति॒ । आ॒यवः॑ ॥ ९.१०७.१७

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:107» मन्त्र:17 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:15» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:17


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मरुत्वते) कर्मयोगी द्वारा (सुतः) साक्षात्कार किया हुआ (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (मदः) आह्लादक बनकर (इन्द्राय) कर्मयोगी के लिये (पवते) पवित्रता प्रदान करता है, (सहस्रधारः) अनन्तशक्तियुक्त परमात्मा (अति, अव्यम्) अत्यन्त रक्षा को (अर्षति) प्राप्त होता अर्थात् करता है (तम्) उक्त परमात्मा को (आयवः) कर्मयोगी लोग (मृजन्ति) साक्षात्कार करते हैं ॥१७॥
भावार्थभाषाः - यहाँ भी कर्मयोगी उपलक्षणमात्र है, वास्तव में सब प्रकार के योगियों का यहाँ ग्रहण है कि वह परमात्मा का साक्षात्कार करके सुरक्षित रहकर आह्लादक तथा सुखकारी पदार्थों का उपभोग करते हैं ॥१७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जितेन्द्रियता- प्राणसाधना व क्रियाशीलता

पदार्थान्वयभाषाः - (सुतः) = उत्पन्न हुआ हुआ (सोमः) = सोम-वीर्य (मरुत्वते) = प्राणों की साधना करनेवाले (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (मदः) = उल्लासजनक होता हुआ (पवते) = प्राप्त होता है । प्राणसाधना व इस साधना द्वारा प्राप्त जितेन्द्रियता सोमरक्षण का साधन बनती है। (सहस्त्रधारः) = ये हजारों प्रकार से धारण करनेवाला सोम (अव्यम्) = रक्षकों में उत्तम पुरुष को (अति अर्षति) = अतिशयेन प्राप्त होता है । (तम्) = उस सोम को (ईम्) = निश्चय से (आयवः) = गतिशील पुरुष (मृजन्ति) = शुद्ध कर पाते हैं, इसे वासनाओं के उबाल से मलिन नहीं होने देते। क्रियाशीलता से सोम पवित्र बना रहता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम का संरक्षण 'जितेन्द्रिय-प्राणसाधक-क्रियाशील' पुरुष ही कर पाते हैं।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मरुत्वते, सुतः) कर्मयोगिना साक्षात्कृतः (सोमः) सर्वोत्पादकः परमात्मा (मदः) आह्लादको भूत्वा (इन्द्राय) कर्मयोगिने (पवते) पवित्रतां प्रददाति (सहस्रधारः) विविधशक्तिमान् परमात्मा (अति, अव्यं) अतिरक्षां (अर्षति) प्राप्नोति (तमीम्) तं च (आयवः) कर्मयोगिनः (मृजन्ति) साक्षात्कुर्वन्ति ॥१७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma, joy of existence, invoked and realised, flows purifying and consecrating for Indra, the vibrant soul, in a thousand streams of ecstasy and overflows the heart and soul of the devotee. That Spirit of the universe, intelligent dedicated yogis realise, exalt and glorify.