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इ॒त ऊ॒ती वो॑ अ॒जरं॑ प्रहे॒तार॒मप्र॑हितम् । आ॒शुं जेता॑रं॒ हेता॑रं र॒थीत॑म॒मतू॑र्तं तुग्र्या॒वृध॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ita ūtī vo ajaram prahetāram aprahitam | āśuṁ jetāraṁ hetāraṁ rathītamam atūrtaṁ tugryāvṛdham ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒तः । ऊ॒ती । वः॒ । अ॒जर॑म् । प्र॒ऽहे॒तार॑म् । अप्र॑ऽहितम् । आ॒शुम् । जेता॑रम् । हेता॑रम् । र॒थिऽत॑मम् । अतू॑र्तम् । तु॒ग्र्य॒ऽवृध॑म् ॥ ८.९९.७

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:99» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:3» मन्त्र:7 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:7


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'तुग्र्यावृध' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वः) = तुम्हारे (अजरम्) = जरा को दूर करनेवाले, (प्रहेतारम्) = शत्रुओं को दूर प्रेरित करनेवाले (अप्रहितम्) = किसी से भी पराषित न होनेवाले, (आशुम्) = वेगवान्, (जेतारम्) = शत्रुओं को पराजित करनेवाले, (हेतारम्) = शत्रुओं को दूर कम्पित करनेवाले प्रभु को (ऊती) = रक्षण के लिये (इतः) = द्यावापृथिवी प्राप्त होते हैं, अर्थात् प्रभु ही सबका रक्षण करते हैं। [२] उस प्रभु को रक्षा के लिये सब प्राप्त होते हैं जो (रथीतमम्) = रथ के सर्वोच्च संचालक हैं, (अतूर्तम्) = किसी से हिंसित होनेवाले नहीं। तथा (तुग्रयावृधम्) = शरीरस्थ रेतःकणरूप जलों का वर्धन करनेवाले हैं। वस्तुतः शत्रुओं का हिंसन करके, शरीर में शक्तिकणों के वर्धन के द्वारा ही, प्रभु हमारा रक्षण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सम्पूर्ण द्यावापृथिवी रक्षण के लिये प्रभु को ही प्राप्त होते हैं। प्रभु शत्रुओं का हिंसन करके हमारा रक्षण करते हैं। वे रेत कणरूप जलों का हमारे में वर्धन करते हैं।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O men and women of the earth, for your protection and progress follow Indra, unaging, all inspirer and mover, himself unmoved and self-inspired, most dynamic, highest victor, thunderer, master of the chariot of life, inviolable augmenter of strength to victory.