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श्राय॑न्त इव॒ सूर्यं॒ विश्वेदिन्द्र॑स्य भक्षत । वसू॑नि जा॒ते जन॑मान॒ ओज॑सा॒ प्रति॑ भा॒गं न दी॑धिम ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śrāyanta iva sūryaṁ viśved indrasya bhakṣata | vasūni jāte janamāna ojasā prati bhāgaṁ na dīdhima ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

श्राय॑न्तःऽइव । सूर्य॑म् । विश्वा॑ । इत् । इन्द्र॑स्य । भ॒क्ष॒त॒ । वसू॑नि । जा॒ते । जन॑माने । ओज॑सा । प्रति॑ । भा॒गम् । न । दी॒धि॒म॒ ॥ ८.९९.३

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:99» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:3» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:3


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

श्रायन्त इव सूर्यम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सूर्यम् इव) = सूर्य की तरह, अर्थात् जैसे सूर्य की धूप में पसीना आ जाता है, इसी प्रकार (श्रायन्तः) = [आयति To sweat ] श्रम के कारण पसीने से तरवतर होते हुए (इन्द्रस्व) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के (विश्वा इत् वसूनि) = इन सब पदार्थों को [धनों को] (भक्षत) = उपयुक्त करो। बिना श्रम के खाना पाप है। [२] (ओजसा) = ओजस्विता से, बल से जाते - उत्पन्न हुए हुए अथवा (जनमाने) = आगे उत्पन्न होनेवाले धन में (भागं न) = अपने भाग के समान वसु को (प्रतिदीधिम) = धारण करें। हम काम से व बल से धनों का अर्जन करें। उन्हें अपने-अपने भाग के अनुसार बाँटकर खानेवाले बनें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - धूप में जैसे पसीना आ जाता है, उसी प्रकार श्रम से पसीनेवाले होकर हम धनों को कमायें। उन्हें भाग के अनुसार बाँटकर खायें।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Just as the rays of light share and diffuse the radiance of the sun, so you too share and reflect the golden glories of Indra, the cosmic soul. Let us meditate on the divine presence and for our share enjoy the ecstasy of bliss vibrating in the world of past and future creation by virtue of Indra’s omnipresent majesty.