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देवता: इन्द्र: ऋषि: नृमेधः छन्द: बृहती स्वर: गान्धारः
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मत्स्वा॑ सुशिप्र हरिव॒स्तदी॑महे॒ त्वे आ भू॑षन्ति वे॒धस॑: । तव॒ श्रवां॑स्युप॒मान्यु॒क्थ्या॑ सु॒तेष्वि॑न्द्र गिर्वणः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

matsvā suśipra harivas tad īmahe tve ā bhūṣanti vedhasaḥ | tava śravāṁsy upamāny ukthyā suteṣv indra girvaṇaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मत्स्व॑ । सु॒ऽशि॒प्र॒ । ह॒रि॒ऽवः॒ । तत् । ई॒म॒हे॒ । त्वे इति॑ । आ । भू॒ष॒न्ति॒ । वे॒धसः॑ । तव॑ । श्रवां॑सि । उ॒प॒ऽमानि॑ । उ॒क्थ्या॑ । सु॒तेषु॑ । इ॒न्द्र॒ । गि॒र्व॒णः॒ ॥ ८.९९.२

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:99» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:3» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:2


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु स्मरण पूर्वक जीवन को सुभूषित करना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सुशिप्र) = शोभन हनू [जबड़े] व नासिकाओं को प्राप्त करानेवाले, (हरिवः) = प्रशस्त इन्द्रियाश्वों को देनेवाले प्रभो ! (मत्स्वा) = आप इन साधनों द्वारा हमें आनन्दित करिये। (तत् ईमहे) = वही बात हम आप से माँगते हैं। (वेधसः) = ज्ञानी पुरुष (त्वे आभूषन्ति) = आप में निवास करते हुए अपने जीवन को सद् गुणों से भूषित करते हैं। [२] हे (गिर्वणः) = ज्ञान की वाणियों से वननीय [उपासनीय] (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (सुतेषु) = इन सब उत्पन्न पदार्थों में (तव) = आपके (श्रवांसि) = यश (उपयानि) = उपमानभूत हैं तथा (उक्थ्या) = प्रशंसनीय हैं। प्रत्येक पदार्थ आपकी महिमा को प्रकट कर रहा है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ने हमें उत्तम जबड़े, नासिका व इन्द्रियाश्व प्राप्त कराके जीवन को आनन्दमय बनाने के साधन जुटा दिये हैं। हम प्रभु में निवास करते हुए इन साधनों के सदुपयोग कर जीवन को अलंकृत करनेवाले हों। प्रत्येक पदार्थ में प्रभु की महिमा को देखें।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord of golden glory, moving and manifesting by vibrations of joyous energy, arise and exult in the heart. You alone, the wise sages exalt and glorify. Indra, lord adorable in song, when the yajnic communion of meditation is fulfilled, the vibrations of your ecstatic presence are ideal and admirable.