यजमान, सुन्वन्, दक्षिणावान्
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (त्वम्) = आप (यम्) = जिस (अश्वम्) = कर्मों में व्याप्त होनेवाली [कमेन्द्रियों] को (गाम्) = ज्ञानेन्द्रियों को तथा (अव्ययम्) = व्ययित न होनेवाले भजनीय धन को (दधिषे) = धारण करते हैं। (तम्) = उसे (तस्मिन्) = उस यजमाने यज्ञशील, (सुन्वति) = सोम का सम्पादन करनेवाले (दक्षिणावति) = दानशील पुरुष में धेहि स्थापित करिये। [२] यह यजमान आप से दी गयी कर्मेन्द्रियों से यज्ञात्मक पवित्र कर्मों को करेगा। ज्ञानेन्द्रियों से सोमरक्षण द्वारा दीप्त बुद्धिवाला बनकर, ज्ञान को प्राप्त करेगा। धन को यह सदा लोकहित के कार्यों में देनेवाला बनेगा। आप इस धन को (पणौ) = वणिक् वृत्तिवाले अयष्टा भोग-प्रसित पुरुष में मत स्थापित करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम यज्ञशील, सोम के रक्षक व दानशील बनें। प्रभु हमें उत्तम कर्मेन्द्रियाँ, ज्ञानेन्द्रियाँ व स्थिर धन प्राप्त करायें।