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स सु॒क्रतू॒ रणि॑ता॒ यः सु॒तेष्वनु॑त्तमन्यु॒र्यो अहे॑व रे॒वान् । य एक॒ इन्नर्यपां॑सि॒ कर्ता॒ स वृ॑त्र॒हा प्रतीद॒न्यमा॑हुः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa sukratū raṇitā yaḥ suteṣv anuttamanyur yo aheva revān | ya eka in nary apāṁsi kartā sa vṛtrahā pratīd anyam āhuḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । सु॒ऽक्रतुः॑ । रणि॑ता । यः । सु॒तेषु॑ । अनु॑त्तऽमन्युः । यः । अहा॑ऽइव । रे॒वान् । यः । एकः॑ । इत् । नरि॑ । अपां॑सि । कर्ता॑ । सः । वृ॒त्र॒ऽहा । प्रति॑ । इत् । अ॒न्यम् । आ॒हुः॒ ॥ ८.९६.१९

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:96» मन्त्र:19 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:35» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:19


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुक्रतुः - अनुत्तमन्युः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह प्रभु (सुक्रतुः) = शोभन प्रज्ञान व शक्तिवाले हैं। (यः) = जो (सुतेषु) = सब उत्पन्न पदार्थों में रमण करनेवाले हैं। [२] वे प्रभु (अनुत्तमन्युः) = अनष्ट ज्ञानवाले हैं, (य:) = जो (अहा इव) = सूर्य से दीप्त दिवसों के समान (रेवान्) = प्रकाश की सम्पत्तिवाले हैं। प्रभु प्रकाशमय ही हैं। [२] (यः) = जो (एक: इत्) = अद्वितीय ही, बिना किसी अन्य की सहायता के ही (नरि) = उन्नतिपथ पर चलनेवाले मनुष्यों में (अपांसि) = लोक हितकारी कर्मों को कर्ता करनेवाले हैं। (सः) = वे प्रभु ही (वृत्रहा) = वासना का विनाश करते हैं। इस प्रभु को (इत्) = ही (अन्यं प्रति आहुः) = सब शत्रुओं का सामना करनेवाला कहते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शोभन शक्ति व प्रज्ञानवाले हैं। वे सर्वत्र व्याप्त हैं। नर पुरुषों में प्रभु ही सब उत्तम कर्मों को करनेवाले हैं। प्रभु ही शत्रुओं का अभिभव करते हैं।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - You are the hero of noble action, happy celebrant of life and divinity in yajnic gatherings of knowledge, enlightenment and advanced action. Unsurpassed is your passion for action, and your splendour and generosity is like the light of day.