पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (शुद्धः) = शुद्धस्वरूप आप (हि) = निश्चय से (नः) = हमारे लिये (रयिम्) = धन को दीजिये । (शुद्धः) = शुद्धस्वरूप आप (दाशुषे) = आपके प्रति अपना अर्पण करनेवाले आप उपासकों के लिये (रत्नानि) = रमणीय धनों को दीजिये । [२] (शुद्धः) = अपापविद्ध, पूर्ण पवित्र, के भी (वृत्राणि) = ज्ञान के आवरणभूत मलों को जिघ्नसे नष्ट कर देते हैं। (शुद्धः) = पूर्ण पवित्र आप इन वृत्रों के विनाश के द्वारा (वाजम्) = बल को (सिषाससि) = हमारे लिये देने की कामना करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु उपासक को धन - रमणीय रत्न व बल को प्राप्त कराते हैं। इसके मलों को विनष्ट करते हैं। शुद्ध बनकर यह ज्ञान की ज्योति का विस्तार करनेवाला 'द्यु-तान' बनता है। अथवा 'द्योतते, आ अनिति च' = ज्ञान - ज्योति से दीप्त होता है और अंग-प्रत्यंग में प्राणशक्तिवाला होता है। प्राणों की साधना से ऐसा बनने के कारण यह 'मारुतः' कहलाता है। यह 'द्युतान मारुत' ही अगले सूक्त का ऋषि है-