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आदु॑ मे निव॒रो भु॑वद्वृत्र॒हादि॑ष्ट॒ पौंस्य॑म् । अजा॑तशत्रु॒रस्तृ॑तः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ād u me nivaro bhuvad vṛtrahādiṣṭa pauṁsyam | ajātaśatrur astṛtaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आत् । ऊँ॒ इति॑ । मे॒ । नि॒ऽव॒रः । भु॒व॒त् । वृ॒त्र॒ऽहा । अ॒दि॒ष्ट॒ । पौंस्य॑म् । अजा॑तऽशत्रुः । अस्तृ॑तः ॥ ८.९३.१५

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:93» मन्त्र:15 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:23» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:15


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

निवरः [प्रभु]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (आद् उ) = अब शीघ्र (ही) = निश्चय से प्रभु (मे) = मेरे लिये (निवर:) = शत्रुओं का निवारण करनेवाले (भुवत्) = होते हैं। और हे (वृत्रहा) = वासनारूप शत्रु का नाश करनेवाले प्रभु (पौंस्यम्) = बल को (अदिष्ट) = मेरे लिये देते हैं। [२] ये प्रभु (अजातशत्रुः) = अजातशत्रु हैं। प्रभु का कोई भी शासन करनेवाला नहीं हो सकता। (अस्तृतः) = प्रभु किसी से हिंसित नहीं होते। प्रभु का उपासक भी अजातशत्रु व अहिंसित बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमारे शत्रुओं का निवारण करते हैं और वासना विनाश द्वारा हमारे में बल का स्थापन करते हैं। वे कभी किसी से हिंसित नहीं किये जा सकते।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Then Indra, the soul, the higher mind, my saviour, destroyer of evil, provides me strength, and, undaunted, I stir and become unchallengeable by enemies.