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अ॒यं वां॑ घ॒र्मो अ॑श्विना॒ स्तोमे॑न॒ परि॑ षिच्यते । अ॒यं सोमो॒ मधु॑मान्वाजिनीवसू॒ येन॑ वृ॒त्रं चिके॑तथः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayaṁ vāṁ gharmo aśvinā stomena pari ṣicyate | ayaṁ somo madhumān vājinīvasū yena vṛtraṁ ciketathaḥ ||

पद पाठ

अ॒यम् । वा॒म् । घ॒र्मः । अ॒श्वि॒ना॒ । स्तोमे॑न । परि॑ । सि॒च्य॒ते॒ । अ॒यम् । सोमः॑ । मधु॑ऽमान् । वा॒जि॒नी॒व॒सू॒ इति॑ वाजिनीऽवसू । येन॑ । वृ॒त्रम् । चिके॑तथः ॥ ८.९.४

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:9» मन्त्र:4 | अष्टक:5» अध्याय:8» वर्ग:30» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:2» मन्त्र:4


शिव शंकर शर्मा

पुनः उसी अर्थ को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे अश्वयुक्त राजा और अमात्यवर्ग ! (वाम्) आप दोनों के निमित्त जो (अयम्+वाम्+घर्मः) यह तरल पेय वस्तु (स्तोमेन) पवित्र विधि के साथ (परिषिच्यते) बनाया जाता है और हे (वाजिनीवसू) हे बुद्धिधनो=हे सर्वधनो ! (अयम्+सोमः) यह सोमरस भी (मधुमान्) परम मधुर है, इनको प्रथम आप पीवें (येन) जिससे आप (वृत्रम्) निवारणीय विघ्न को (चिकेतथः) जान सकेंगे ॥४॥
भावार्थभाषाः - राजा विविध भोगों को भोगता हुआ प्रजाओं की रक्षा करे ॥४॥

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष ! (अयम्) यह (वाम्) आपका (धर्मः) युद्धादि कार्य्य के प्रारम्भ का दिवस (स्तोमैः) स्तोत्रों द्वारा (परिषिच्यते) उत्साहवर्धक किया जाता है (वाजिनीवसू) हे बलयुक्त सेनारूप धनवाले ! (अयम्, मधुमान्, सोमः) यह मधुर सोम है, (येन) जिससे आप (वृत्रम्) अपने शत्रु को (चिकेतथः) जानते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - हे बलसम्पन्न सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! हम लोग युद्ध के प्रारम्भ में स्तोत्रों द्वारा आपके विजय की प्रार्थना करते हैं, आप इस सोमरस को पान करके शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

धर्म-सोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! (अयम्) = यह (वाम्) = आपका (घर्म:) = तेज स्तोमेन प्रभु-स्तवन के साथ (परिषिच्यते) = शरीर में चारों ओर सिक्त होता है। जब प्रभु-स्तवन के साथ प्राणसाधना चलती है, तो शरीर में सब अंग तेजस्विता से सिक्त होते हैं। [२] हे (वाजिनीवसू) = शक्तिरूप धनोंवाले प्राणापानो! (अयम्) = यह (वाम्) = आपका, आपके द्वारा शरीर में सुरक्षित होनेवाला, (सोमः) = सोम [वीर्य शक्ति] (मधुमान्) = जीवन को मधुर बनाने वाला है। (येन) = जिस सोम के द्वारा (वृत्रम्) = ज्ञान की आवरणभूत वासना को (चिकेतथः) = आप हन्तव्य रूप में जानते हो। [ हन्तव्यतया जानीथः, हिन्दी में भी यह शब्द प्रयोग 'अच्छा, मैं तुझे समझ लूँगा' इस रूप में होता है]। सोम शक्ति के रक्षण से ही वासनाओं का विनाश होकर ज्ञान की वृद्धि होती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु-स्तवन के साथ प्राणसाधना के चलने पर शरीर में तेजस्विता व सोम का रक्षण होता है।

शिव शंकर शर्मा

पुनस्तमेवार्थमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विना=हे अश्विनौ अश्वयुक्तौ राजानौ ! वाम्=युवयोर्निमित्तम्। अयं घर्मः=“घृ क्षरणदीप्त्योः” किञ्चित् क्षरणशीलं तरलं पेयं वस्तु घर्मः सः। स्तोमेन=पवित्रविधिना। परिषिच्यते=प्रस्तूयते=पच्यते। तथा। हे वाजिनीवसू=वाजिनी बलवती बुद्धिः सैव वसूनि धनानि ययोस्तौ। अयं सोमोऽपि। मधुमान्=मधुरोऽस्ति। इमौ घर्मसोमौ प्रथमं पिबतम्। येन पानेन। वृत्रमावरकं विघ्नम्। चिकेतथः=निवारयितव्यतया=ज्ञास्यथः ॥४॥

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे सेनाध्यक्षसभाध्यक्षौ ! (वाम्) युवयोः (अयम्, धर्मः) अयं युद्धादिकार्यप्रारम्भदिवसः (स्तोमैः) स्तुतिभिः (परिषिच्यते) उत्साहवर्द्धकः क्रियते (वाजिनीवसू) हे बलयुक्तसेनाधनौ ! (अयम्, मधुमान्, सोमः) अयं ते सोमः मधुरः (येन) येन सोमेन (वृत्रं) शत्रुम् (चिकेतथः) जानीथः ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This is the yajnic fire of the season, Ashvins, which is dedicated and exalted in your honour with the chant of hymns, and this is the soma sweetened and seasoned for you, O heroes of the battle for wealth and victory, by which you would know and dare the enemy, the demon of darkness, ignorance, injustice and poverty.