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आ॒मासु॑ प॒क्वमैर॑य॒ आ सूर्यं॑ रोहयो दि॒वि । घ॒र्मं न साम॑न्तपता सुवृ॒क्तिभि॒र्जुष्टं॒ गिर्व॑णसे बृ॒हत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

āmāsu pakvam airaya ā sūryaṁ rohayo divi | gharmaṁ na sāman tapatā suvṛktibhir juṣṭaṁ girvaṇase bṛhat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ॒मासु॑ । प॒क्वम् । ऐर॑यः । आ । सूर्य॑म् । रो॒ह॒यः॒ । दि॒वि । घ॒र्मम् । न । साम॑न् । त॒प॒त॒ । सु॒वृ॒क्तिऽभिः॑ । जुष्ट॑म् । गिर्व॑णसे । बृ॒हत् ॥ ८.८९.७

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:89» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:12» मन्त्र:7 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:7


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभुस्तवन द्वारा ज्ञानवृद्धि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! आप ही (आमासु) = हमारी अपरिपक्व बुद्धियों में (पक्वम्) = परिपक्व ज्ञान को (ऐरय:) = प्रेरित करते हैं और आप ही (दिवि) = हमारे मस्तिष्करूप द्युलोक में (सूर्यम्) = ज्ञान - सूर्य को (आरोहयः) = आरूढ़ करते हैं। [२] (घर्मं न) = [Sunshine ] वे प्रभु सूर्यप्रकाश के समान दीप्त हैं [आदित्यवर्णम्] । (सामन्) = शान्ति के निमित्त उस प्रभु को (सुवृक्तिभिः) = सम्यक् दोषवर्जन हेतुभूत स्तुतियों से (तपता) = दीप्त करो। (गिर्वणसे) = स्तुतिवाणियों के द्वारा सेवनीय उस प्रभु के लिये (बृहत्) = यह बृहत् साम [स्तुति] जुष्टम् प्रीतिकर होती है। स्तुति हमें प्रभु का प्रिय बनाती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम जितना प्रभु का स्तवन करते हैं, उतना ही प्रभु को प्रिय होते हैं। प्रभु हमारे मस्तिष्करूप द्युलोक में ज्ञानसूर्य का आरोहण करते हैं। = अगला सूक्त भी 'नृमेध पुरुमेधौ' ऋषियों का ही है-

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - You move the ripening flow of sap in the veins of maturing forms of life. You raise and place the sun in the high heaven. O celebrants, as in the heat of fire, temper and shine your sama songs of adoration and, with noble hymns of praise, sing resounding Brhat samans of worship with love in honour of adorable Indra.