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देवता: इन्द्र: ऋषि: नोधा छन्द: निचृद्बृहती स्वर: मध्यमः
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प्र हि रि॑रि॒क्ष ओज॑सा दि॒वो अन्ते॑भ्य॒स्परि॑ । न त्वा॑ विव्याच॒ रज॑ इन्द्र॒ पार्थि॑व॒मनु॑ स्व॒धां व॑वक्षिथ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra hi ririkṣa ojasā divo antebhyas pari | na tvā vivyāca raja indra pārthivam anu svadhāṁ vavakṣitha ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । हि । रि॒रि॒क्षे॒ । ओज॑सा । दि॒वः । अन्ते॑भ्यः । परि॑ । न । त्वा॒ । वि॒व्या॒च॒ । रजः॑ । इ॒न्द्र॒ । पार्थि॑वम् । अनु॑ । स्व॒धाम् । व॒व॒क्षि॒थ॒ ॥ ८.८८.५

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:88» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:11» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:5


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्व-धा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! आप (हि) = निश्चय से (दिवः परि अन्तेभ्यः) = द्युलोक पर्यन्तों से भी (ओजसा) = अपने बल से (प्ररिरिक्षे) = अतिरिक्त होते हैं। यह द्युलोक आपकी शक्ति को व्याप्त नहीं कर पाता। यह (पार्थिवं रजः) = पार्थिव लोक भी (त्वा न विव्याच) = आपको व्याप्त नहीं कर पाता। प्रभु को ये द्यावापृथिवी अपने सीमित करनेवाले नहीं होते। [२] हे (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो ! आप (स्वधां अनु ववक्षिथ) = हमारे लिये आत्मधारणशक्ति को प्राप्त कराने की कामना करिये। आपकी उपासना हमें 'स्व-धा' को प्राप्त करानेवाली हो। आत्मधारणशक्ति से युक्त होकर हम अधिक और अधिक आपके समीप हो सकें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु को ये द्यावापृथिवी माप नहीं सकते। प्रभु का ओज इनमें समा नहीं पाता। प्रभु का उपासन हमें भी स्वधा = आत्मधारणशक्तिवाला बनाये।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - You transcend the bounds of heaven by your might. The regions of earth and skies encompass you not. Indra, lord of majesty and omnipotence, bring us food, strength and the divine power of sustenance for life.