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व॒यं हि वां॒ हवा॑महे विप॒न्यवो॒ विप्रा॑सो॒ वाज॑सातये । ता व॒ल्गू द॒स्रा पु॑रु॒दंस॑सा धि॒याश्वि॑ना श्रु॒ष्ट्या ग॑तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vayaṁ hi vāṁ havāmahe vipanyavo viprāso vājasātaye | tā valgū dasrā purudaṁsasā dhiyāśvinā śruṣṭy ā gatam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

व॒यम् । हि । वा॒म् । हवा॑महे । वि॒प॒न्यवः॑ । विप्रा॑सः । वाज॑ऽसातये । ता । व॒ल्गू इति॑ । द॒स्रा । पु॒रु॒ऽदंस॑सा । धि॒या । अश्वि॑ना । श्रु॒ष्टी । आ । ग॒त॒म् ॥ ८.८७.६

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:87» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:10» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:6


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विप्रासः विपन्यवः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्राणापानो! (वयम्) = हम (विपन्यवः) = विशिष्ट स्तुतिवाले होते हुए (वि प्रासः) = विशेषरूप से अपना पूरण करनेवाले ज्ञानी बनकर (वाजसातये) = शक्ति की प्राप्ति के लिये (हि) = निश्चयपूर्वक (वाम्) = आपको (हवामहे) = पुकारते हैं प्राणसाधना ही तो हमें सब शक्तियों को प्राप्त कराती है। [२] हे (अश्विना) = प्राणापानो! (ता) = वे आप दोनों (वल्गू) = सुन्दर गतिवाले हो - जीवन को उत्तम गतिवाला बनाते हो । (दस्त्रा) = शत्रुओं का उपक्षय करनेवाले हो । (पुरुदंससा) = पालक व पूरक कर्मोंवाले हो- आप शरीर का पालन करते हो, तो मन का आप पूरण करनेवाले हो। आप (धिया) = बुद्धि को प्राप्त कराने के हेतु से (श्रुष्टी) = शीघ्र ही (आगतम्) = हमें प्राप्त होओ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना हमें शक्ति प्राप्त कराती है - यह हमें बुद्धि देती है। शक्ति व बुद्धि से सम्पन्न बनकर हम स्तोता, ज्ञानी व पवित्र जीवनवाले बन पाते हैं। यह विपन्यु [स्तोता] ही अगले सूक्त का ऋषि 'नोधा' बनता है [नौति इति नोधा:] यह इन्द्र का स्तवन करता हुआ कहता है-

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, virile men and women, vibrant, wise and devout, we call upon you for victory and advancement in energy, food, honour and excellence. Ashvins, noble and cultured, destroyers of negativities, versatile in various actions, come without delay with active intelligence, full awareness and spirit of action.